Wednesday, September 23, 2020

कुन फ़यकून (Kun Fayakoon: The Creation Process Dr. Anwer Jamal)

 


कुन फ़यकून  (Kun Fayakoon: The Creation Process Dr. Anwer Jamal)

http://allahpathy.blogspot.com/2017/05/kun-fayakoon-creation-process-dr-anwer.html

कुन फ़यकून 
हमने बचपन में सुना था कि अल्लाह जिस काम को करना चाहता है, उसे ‘कुन’ (हो जा) कहता है और ‘फ़यकून’ यानि फिर वह काम हो जाता है। हमारे दिल में ख़याल आया कि अगर हमारे पास भी यह ताक़त होती तो हम भी अपनी पसन्द के अच्छे काम कर लेते। किसी परेशान हाल की, किसी ग़रीब की मदद कर देते। किसी दुख के मारे का दुख दूर कर देते। हमारे दिल में ‘कुन फ़यकून’ के बारे में एक जिज्ञासा पैदा हुई और फिर वह बनी रही। हम चालीस साल से ज़्यादा पढ़ते रहे। जिसमें हमारे 30 साल ख़ालिस दीन, साईन्स, फ़लसफ़े और मुख़्तलिफ़ आर्ट्स को पढ़ने और समझने में गुज़र गए। हमने क़ुरआन, हदीस, सीरत, सुन्नत, सूफ़ी कलाम, बाइबलि, वेद, आयुर्वेद, गीता, योग, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सन्तों की वाणी, तिब्बे नबवी, तिब्बे यूनानी, होम्योपैथी, नेचुरोपैथी, बायोकेमिक रेमेडीज़, हिप्नोथेरेपी, एक्यूप्रेशर सु-जोक, अरोमा थेरेपी, सायकोलोजी, एनएलपी, वेलनेस साइन्सेज़ और बहुत सी दूसरी हीलिंग आर्ट्स को पढ़ा। जिसने भी इन्सान के दुख दूर होने के बारे में कुछ कहा, हमने उसे जानने की कोशिश की। हमने दूर और पास के सफ़र किए। हरेक सब्जेक्ट के एक्सपर्ट्स से मिलने का मौक़ा मिला। ज़िन्दगी के सफ़र में हम फ़िल्म एक्टर्स और डायरेक्टर्स से लेकर नेता, फ़ौजी, पहलवान, खिलाड़ी, योगी, सन्यासी, मुफ़्ती, आलिम और सूफ़ी बुज़ुर्गों से मिलते रहे। सबने अपने सीने के राज़ दिए, जो कि उनके अपने तजुर्बात थे। कामयाब और नाकाम, अमीर और ग़रीब, सुखी और दुखी, दरोग़ा, वकील, जज और मुजरिम सब तरह के लोग हमसे मिलते रहे। उनकी ज़िन्दगी के हालात देखकर हम ग़ौर करते थे कि जिसने जो किया, उसने वही क्यों किया? और जिसके साथ जो हुआ, उसके साथ वही क्यों हुआ? जिसने भी ‘कुन फ़यकून’ पर कुछ लिखा या बोला था, हमने उसे पढ़ा और सुना। एक लम्बी मुद्दत तक यह सिलसिला चलता रहा। फिर सारी कड़ियाँ जुड़ती चली गईं। जो तलाश करता है, वह पा लेता है।
हमने पाया कि कुन फ़़यकून की पॉवर रब के पास है और वह रब हमारे पास है। वह हमारी शहरग से भी ज़्यादा हमारे क़रीब है। हम तन्हाई में अपने दिल की गहराई में भी जो सोचते हैं, वह उसे जानता है। हमारा हर बोल और हमारा हर हाल वह देख रहा है। हमारी हर बात उसके लिए एक दुआ, एक पुकार है। कभी हम उसे बोल कर ज़ुबान से पुकारते हैं और कभी हम ख़ामोश रहकर उसे ज़ुबाने हाल से पुकारते हैं। वह हमेशा हमारी हर पुकार का जवाब देता है। जैसा हमारा यक़ीन होता है, हमारी पुकार वैसा ही जवाब लेकर लौटती है। दुआ हमारा हथियार है, ख़ुदा हमारी ताक़त है। हमारे पास हमारे गुमान से ज़्यादा पॉवर है। बस हमें ग़फ़लत और जहालत से उठकर शुऊर और हिदायत के साथ जीना सीखना है।
हम अपनी उम्र भर की स्टडी, रिसर्च और तजुर्बात को आपको सौंप रहे हैं। यह एक ऐसी चाबी (master key) है, जिससे हरेक ताला खोला जा सकता है। इसकी क़द्र वही लोग करेंगे, जो ज़िन्दगी में किसी मसले का हल तलाश कर रहे हैं। जो ज़िन्दगी की पहेली को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। जो जानना चाहते हैं कि दुख, बीमारी, ग़रीबी और पस्ती की असली वजह क्या है और अल्लाह की मदद से इनसे कैसे निकला जाए?



आपकी सारी समस्याओं के पीछे असली वजह क्या है?
जहालत, ‘अज्ञान’ आपकी सारी समस्याओं की असली वजह है। आप और यह यूनिवर्स अपने क्रिएटर के जिस क़ानून के पाबन्द हैं, आप उस क़ानून को नहीं जानते। सारा यूनिवर्स उसी को समर्पित है। अरबी में समर्पण को इसलाम कहते हैं। इसलाम का अर्थ है ‘समर्पण और रब के क़ानून पर चलना’। आपके दुख और आपकी सारी परेशानियों के पीछे असल वजह यही है कि आपने समर्पण नहीं किया और आप रब के क़ानून पर नहीं चलते। आप जिस समाज में पैदा हुए, उसी समाज की सोच आपकी सोच बन गई। सबके दिल में जो आता है, वे करते हैं। जो वे करते हैं, वैसा ही आप भी करते हैं। फिर जो हाल उनका होता है, वही हाल आपका हो जाता है।
एक मिसाल से आप इस बात को समझें। सब लोग मनोरन्जन करते हैं तो आप भी करते हैं। आप टी. वी. और इन्टरनेट पर सीरियल्स और मूवीज़ देखते हैं। हरेक सीरियल और मूवी के हीरो हीरोईन को बहुत ज़ुल्म सहने पड़ते हैं। उन्हें ज़ालिमों और गुन्डों से बचना, भागना या लड़ना पड़़ता है। जब आप यह सब देखते हैं, तब आपके दिल पर उसका असर आ रहा होता है। आपको ऐसा लगता है जैसे कि वह सारे हालात आप पर ही गुज़र रहे हों। हीरो हीरोईन की जगह आप ख़ुद को महसूस करते हैं। उनका सुख आपाका सुख, उनका दुख आपका दुख और उनका नज़रिया आपका नज़रिया बन जाता है और आपको पता भी नहीं चलता। आप बहुत से नज़रिये पेश करने वाली मूवीज़ देखते हैं। वे सब नज़रिये एक दूसरे में उलझ जाते हैं। नतीजा यह होता है कि आपका नज़रिया उलझकर रह जाता है।
मनोरन्जन का मतलब है ‘मन को रंगना’। जिन बातों से आपका मन रंगा गया है, उनसे ज़िन्दगी के बारे में आपका एक नज़रिया बन गया है। नज़रिया ही वह सबसे बुनियादी वजह है, जिसके अन्जाम आपकी ज़िन्दगी के हालात में झलकते हैं। नज़रिये में टेढ़ आ जाए तो ज़िन्दगी में भी टेढ़ आ जाएगा। किसी के साथ कोई समझदार दुश्मन दुश्मनी करता है तो वह उसके बच्चों को बुरी सोहबत में डाल देता है। जिससे उनका नज़रिया और फिर उनकी आदतें ख़राब हो जाती है। फिर वे ख़राब काम ख़ुद ब ख़ुद करते हैं और उनका ख़राब अन्जाम ख़ुद ब ख़ुद पाते रहते हैं। उसके लिए दुश्मन को कुछ नहीं करना पड़ता। शैतान ने मनोरन्जन के ज़रिये आपका नज़रिया ख़राब कर दिया है।
आप मनोरन्जन के लिए गाने सुनते हैं। जैसे कि

दुनिया बड़ी ज़ालिम है
दिल तोड़के हंसती है

यार यार न रहा प्यार प्यार न रहा
ज़िन्दगी हमें तेरा ऐतबार न रहा

आप गए थे मज़े लेने, अज़़ाब गले पड़ गया। आपको यह बात बहुत मामूली लग सकती है लेकिन यही एक बात सबसे ज़्यादा अहमियत रखती है। अगर आपके हालात ख़राब हैं और आपको उनसे नजात का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है तो यह तय है कि आपका नज़रिया ख़राब है। नज़रिये का मतलब आपके अन्दर की तमाम चीज़ों से है जैसे कि आपके अक़ीदे, आपके गुमान, आपकी नीयतें, आपके जज़्बे, आपके एहसास। इन्हीं से आपका मेन्टल एटीट्यूड तय होता है, जिससे आप ज़िन्दगी को और दुनिया के हालात को देखते हैं और फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। इसी से आपके हालात बनते हैं और उन्हें भी आप अपने नज़रिये के मुताबिक़ ही महसूस करते हैं।


शादियों के नाकाम होने की वजह
‘शादी’ लफ़्ज़ का मतलब है ‘ख़ुशी’। जो लोग ख़ुश रहना जानते हैं, सिर्फ़ वही ख़ुश रह सकते हैं। जो लोग ख़ुश रहना नहीं जानते, वे ख़ुद दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख देते हैं। जिसके पास जो है, वह दूसरों को वही दे सकता है। आप देख सकते हैं कि लड़के और लड़कियों को ख़ुश रहने और ख़ुशी देने के तरीक़ों की जानकारी नहीं है।
कल आबिदा ने व्हाट्स एप पर हमसे टाईम लिया और कई वॉयस मैसेज भेजे। कुछ साल पहले उसकी शादी हुई थी। उसने हमें कुछ महीने पहले बताया था कि उसका शौहर उससे प्यार नहीं करता। अब उसने बताया कि कुछ महीने पहले उसकी छोटी बहन ज़ाहिदा के लिए अचानक एक रिश्ता आया। लड़का किसी अरब मुल्क में काम करता है। उसके पास काफ़ी दौलत है। वह कोलकाता में एक करोड़ रूपये का एक मकान बना रहा है। जिसकी तामीर चल रही है। हमारे घरवालों ने देखा कि बड़ा अच्छा रिश्ता है। हमने उससे अपनी बहन की शादी कर दी। एक महीने तक हमारी बहन बहुत ख़ुश रही। फिर उसका शौहर विदेश चला गया। उसकी ससुराल वालों ने बहुत अच्छे तरीक़े से हमारी बहन को विदा किया। मायके आने के बाद ज़ाहिदा के शौहर ने अपनी बीवी को एक बार भी कॉल नहीं की। ज़ाहिदा ने कॉल की तो उसने उसे ब्लॉक कर दिया। हमने उसकी ससुराल वालों को कॉल किया तो उन्होंने भी कॉल ब्लॉक कर दी। हम बहुत परेशान हो गए। चारों भाई अपनी बहन के साथ ससुराल गए। उसे वहां छोड़कर आए। अब हमारी बहन वहां पर रह रही है। उसका शौहर उसे अब भी फ़ोन नहीं करता। उसे वहां रहकर पता चला कि उसके शौहर का अपनी भाभी के साथ नाजायज़ ताल्लुक़ है। वह अपनी भाभी से फ़ोन पर बात करता है लेकिन अपनी बीवी से बात नहीं करता। उसके शौहर का भाई मामूली काम करता है और उसके दो लड़कियां हैं। हमारी बहन रोती रहती है। है। आज भी हम तीनों बहनों ने मोबाईल पर कॉन्फ्ऱेन्स की। हमारी तीसरी बहन माजिदा ने उसे हंसी दिलाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह लगातार रोती रही। छोटी बहन ने उससे आपका ज़िक्र किया और कहा कि आप अपनी प्रॉब्लम डॉक्टर साहब को बताओ, वह इसका कोई हल बता देंगे। वह बहुत लोगों के इस तरह के मसले हल करते रहते हैं। उसने कहा कि मैं बीमार थोड़े ही हूं जो डॉक्टर से कुछ बताऊँ।
फिर उसने रिक्वेस्ट की कि डॉक्टर साहब प्लीज़ कुछ पढ़ने के लिए बता दीजिए ताकि हमारी बहन का मसला हल हो जाए। पढ़ने के लिए क़ुरआन है। उसके अलावा हम पढ़ने के लिए क्या बता दें?
एक बहन की ज़िन्दगी में दुख देखकर हम काफ़ी देर तक सोचते रहे, यह नहीं कि यह दुख क्यों है और न ही यह कि इस दुख को कैसे दूर किया जाए?
नहीं, बल्कि हम यह सोचते रहे कि हम इन्हें कैसे समझाएं कि इनकी समझ में आ जाए। अगर हम इन्हें बताएंगे कि इनके दुखों की वजह इनका नज़रिया है तो ये नहीं मानेंगे। कोई भी अपने हाल की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेने को तैयार नहीं है। जब तक इन्सान अपने हाल की ज़िम्मेदारी ख़ुद पर नहीं लेगा, वह ख़ुद को हालात का शिकार और मज़्लूम मानता रहेगा और जो वह मानता रहेगा, वही वह बना रहेगा। हमें इस हक़ीक़त को समझने में  ख़ुद 30 साल से ज़्यादा लग गए। कोई दूसरा चन्द मिनट में न समझ पाए तो वह बिल्कुल दुरूस्त है।
हमने व्हॉटस एप पर जवाब में वह बात लिखी, जिसे वह समझ सकती थीं। हमने लिखा-‘आपने अपनी बहन की शादी करते वक़्त लड़के का माल देखा लेकिन उसके आमाल नहीं देखे। आप धोखा खा गए हैं। जल्दबाज़ी के फ़ैसले दुख ही देते हैं।’
हक़ीक़त यह है कि दूल्हा दुल्हन से शादी या निकाह लफ़्ज़ का मतलब पूछा जाए तो वे न बता सकेंगे। अगर उनसे निकाह की आयत के बारे में पूछा जाए, जिसे क़ाज़ी निकाह के वक़्त पढ़ता है तो वे उसका भी मतलब न बता पाएंगे। बहुत से दूल्हा दुल्हन कलिमा तक नहीं पढ़ सकते। वे नहीं जानते कि इस्लाम में पति पत्नी के एक दूसरे पर क्या हक़ हैं और उन्हें कैसे अदा करना है? उन्हें यह भी पता नहीं है कि हिन्दुस्तानी क़ानून में पति और पत्नी के क्या अधिकार हैं?
हम आलिमों के शुक्रगुज़ार हैं कि उन्होंने इस बारे में ने बड़ी मोटी मोटी और बहुत क़ीमती किताबें हर ज़बान में लिखी हैं लेकिन दूल्हा दुल्हन ने वे किताबें कभी पढ़ी ही नहीं होतीं। अगर वे उन किताबों को पढ़ते और फिर निकाह करते तो उन्हें शादीशुदा ज़िन्दगी में कामयाबी और ख़ुशी ज़रूर मिलती। निकाह के वक़्त क़ाज़ी साहब को दोनों से यह ज़रूर जानना चाहिए कि वे दोनों निकाह के अहकाम जानते हैं या नहीं? जो नहीं जानते उन्हें निकाह से पहले निकाह के शरई अहकाम और अख़लाक़ी ज़िम्मेदारियों से वाक़िफ़ करा दिया जाए। इससे शादी के बाद झगड़े और तलाक़ के मामलों में कमी आ जाएगी।
शादी की तैयारी में दूल्हा और दुल्हन के घर वाले सिर्फ़ ज़ेवर, कपड़े, बर्तन, फ़र्नीचर, होटल और दावत की तैयारी करते हैं, दूल्हा और दुल्हन की नफ़्सियाती और अख़लाक़ी तैयारी को सिरे से नज़र अन्दाज़ कर दिया जाता है। जिस काम को भी बिना मुनासिब तैयारी के किया जाएगा, वह काम ख़राब होना तय है। जो निकाह बिना तैयारी के किए जाते हैं, उनका ख़राब होना भी तय होता है।
मस्जिदों में जुमा के ख़ुत्बों में सही जानकारी देकर इस ख़राबी को दूर किया जा सकता है। निकाह के वक़्त भी क़ाज़ी साहब सबको इस बारे में जानकारी दें। सबको छुहारों के साथ एक एक किताब भी तोहफ़े में दे दी जाए तो सबको निकाह की कामयाबी के उसूल मालूम हो जाएंगे। इस सब्जेक्ट पर बने ऑडियो और वीडियो को भी शेयर किया जा सकता है। निकाह एक इबादत है। इसे ज़्यादा से ज़्यादा अच्छा बनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारे निकाह से हमारा रब ख़ुश हो। इसी से हमें ख़ुशी मिलेगी। जिस घर में पति पत्नी में झगड़े रहते हैं, उस घर में बीमारी, क़र्ज़ और बेबरकती क़ब्ज़ा कर लेती है। जिस घर में पति पत्नी में मुहब्बत और तालमेल होता है, उस घर में सेहत, दौलत और बरकत का लेवल बढ़ता रहता है।
निकाह और शादी समर्पण का एक बेहतरीन नमूना है। इससे आप कायनात के सबसे बड़े क़ानून को अमल में लाते हैं। जिस पर आपकी कामयाबी और ख़ुशी निर्भर है। इसलिए भी इसे समझना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। जो इसे नहीं समझेगा, वह ज़िन्दगी में बहुत तरह के मसलों से घिर जाएगा।

मसलों की क़िस्में अनेक
इस तरह के मसले हमारे सामने रोज़ ही आते रहते हैं-
किसी का रिश्ता नहीं हो रहा है,
किसी की शादी ठीक नहीं चल रही है
किसी की तलाक़ होने जा रही है,
कोई ख़ुदकुशी की सोच रहा है,
कोई लाइलाज बीमारी से शिफ़ा पाना चाहता है,
किसी को जॉब नहीं मिल रही है,
किसी को उसका बॉस परेशान कर रहा है,
किसी का बिज़नेस मन्दा चल रहा है,
किसी की आमदनी कम है,
किसी पर क़र्ज़ चढ़ गया है,
कोई मुक़ददमे में फंस गया है,
किसी के पीछें कोई दुश्मन पड़ गया है,
किसी को इलेक्शन का टिकट नहीं मिल रहा है,
कोई इलेक्शन में बार बार हार रहा है,
किसी के घर में कोई न कोई बीमार पड़ता रहता है,
किसी की इज़्ज़त ख़तरे में है,
किसी की जान ख़तरे में है,
किसी का माल ख़तरे में है,
किसी की लड़की घर से चली गई है,
किसी की बीवी घर आने को तैयार नहीं है,
किसी का शौहर उसे मायके से ले जाने को तैयार नहीं है,
.....और भी तरह तरह के नए नए मसले आते रहते हैं। हर आदमी कभी न कभी ख़ुद को फंसा हुआ और नाकाम महसूस करता है। तब उसे ज़िन्दगी बेकार और बेमक़सद लगने लगती है। कोई मरने की और कोई दूसरों को मार देने की सोचने लगता है। वे अपने अन्दर उलझकर रह जाते हैं। ऐसे सब लोग इस उम्मीद में हमारे पास आते हैं कि उनका मसला हल हो जाएगा। सबका असल मसला सिर्फ़ यह है कि उन्हें ‘जीने का सही तरीक़ा नहीं आता’।

जीना आ जाए तो ज़िन्दगी आसान है
हमने एक मोटर सायकिल ख़रीदी। हम उसे चलाना नहीं जानते थे। हमारे बेटे अनस ख़ान अपने क्लासमेट तनुज से मोटर सायकिल चलाना सीख चुके थे लेकिन उम्र कम थी। वह उसका वज़न नहीं सम्भाल पाते थे। पहले ही दिन अनस ख़ान ने हमसे उसे चलाने की परमिशन मांगी। हमारे पास पुलिस लाईन का बहुत बड़ा मैदान है। हमने परमिशन दे दी। दोपहर का वक़्त था। हम सो गए। अनस ख़ान तनुज को बजाज बॉक्सर पर बैठा कर चले गए। थोड़ी ही देर बाद अनस वापस लौट आए। उन्होंने हमें जगाया। बोले कि हमारा एक्सीडेन्ट हो गया है। हमने सबसे पहले अनस को और तनुज को देखा। अल्लाह का शुक्र है कि दोनों ठीक थे। फिर हमने मोटर सायकिल को देखा। उसकी लाईट और सामने की एक दो चीज़ें टूट गई थीं। अनस ने बताया कि सामने से एक मोटर सायकिल वाला बहुत तेज़ स्पीड से आ रहा था। मैंने अपनी बाइक सड़क से नीचे उतारी तो वह कन्ट्रोल से बाहर हो गई और वहां खड़े पोल से टक्कर हो गई। जब हम कोई गाड़ी चलाना सीखते हैं तो इस तरह की छोटी मोटी टक्करें होती हैं। यह एक नॉर्मल बात है। हमने अनस को कुछ नहीं कहा। हमने बाइक में नया सामान लगवा लिया।
अब हम बाइक पर बैठे तो वह हमसे चलकर नहीं दी। जैसे ही हम क्लच छोड़़ते थे, बाइक झटका खाकर बन्द हो जाती थी। अनस ने हमें अच्छी तरह समझाया कि कैसे और क्या करना है? हम ठीक से समझ गए थे लेकिन हमें प्रैक्टिस नहीं थी। जैसे ही हम क्लच छोड़ते थे, गाड़ी बन्द हो जाती थी। बाइक ठीक थी। कम्पनी ने बाइक हमारे आराम के लिए बनाई थी लेकिन वह हमारे लिए परेशानी का सबब बन गई थी। हम सोचने लगे थे कि कम्पनी ने इतना झंझट क्यों खड़ा किया?
एक दिन हमने अपने दोस्त सैयद अफ़ज़ल जमाल को अपने पीछे बैठाया। सिर्फ़ एक बार हमने उनकी हिदायत के मुताबिक़ पुलिस लाईन के मैदान में बाइक चलाई। वह फ़ौरन ही चल गई। हम समझ गए कि कहां चूक हो रही थी। एक हफ़्ते में बाइक कन्ट्रोल में आ गई। हमारे मन में क्लच, गियर, स्पीड, ब्रेक, हॉर्न और बेलेन्स सबका तालमेल बैठ गया। तीन बार एक्सीडेन्ट हुआ। बाइक टूटी लेकिन उसकी मरम्मत कराई और फिर चलाई। यहां तक कि उसे चलाना हमारी आदत बन गया। जब हम कोई काम करते हैं तो शुरू में वह हमें नामुमकिन लगता है। हम उसे किसी गुरू की निगारानी में करते रहते हैं तो वह मुश्किल लगता है। हमें ऐसा लगता है कि शायद यह हमसे नहीं हो पाएगा। गुरू के हौसला बढ़ाने से हम उस काम को लगातार करते रहते हैं। जब वह काम हमारी आदत बन जाता है तब वह आसानी से ख़ुद होता है। फिर उस काम में मशक़्क़त नहीं करनी पड़ती। हक़ीक़त में जीना आ जाए तो ज़िन्दगी आसान है और बेहद हसीन है।
आपको ज़िन्दगी में सख़्त संघर्ष करना पड़ रहा है और फिर भी हालात आपके क़ाबू से बाहर हैं, लोग आपको सता रहे हैं, आपको प्यार के बजाय धोखा और इज़्ज़त के बजाय ज़िल्लत मिल रही है तो आपको जीने का सही तरीक़ा सीखने की ज़रूरत है। जीने का सही तरीक़ा फ़ितरत (प्रकृति, nature) के मुताबिक़ जीना है।

इन्नद्-दीना इन्दल्लाहिल्-इस्लाम।
यक़ीनन अल्लाह की नज़र में समर्पण ही क़ानून और तरीक़ा है। -क़ुरआन 3ः19

ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि प्रकृति का नियम समर्पण है और उन्हें अपने क्रिएटर के प्रति समर्पण करना है। इन्सान प्रकृति के नियम के खि़लाफ़ चल रहा है और नतीजे में दुख भोग रहा है। हमारे पास जो भी दुखी मदद के लिए आता है। हम उससे कहते हैं कि आप समर्पण कीजिए। अपने आपको और अपने मसलों को रब के हवाले कीजिए। ‘समर्पण’ करते ही उसका दुख मिट जाता है क्योंकि दुख का कारण ही मिट जाता है।

‘मैं अपने बन्दे के गुमान के साथ हूँ’
आपको सच्ची ख़ुशी तब मिलती है, जब आप अपने रब की नेचर के बारे में जान जाते हैं। मुजद्दिद अलिफ़ सानी शैख़ अहमद सरहिन्दी साहब रहमतुल्लाहि अलैह ने अपने मक्तूबात में इस हदीसे क़ुद्सी को बार बार बयान किया है, जिसमें रब कहता है कि
‘मैं अपने बन्दे के गुमान के साथ हूँ, जैसा भी गुमान वह मेरे साथ रखता है।’ (बुख़ारी व मुस्लिम)
...और
उसका काम तो यही है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उसे कह दे कि हो जा सो वह हो जाती है। -क़ुरआन, यासीन, आयत 82
रब को आपका गुमान पूरा करने के लिए इन्सानों की तरह भाग दौड़ और जुगाड़ नहीं करना पड़ता। न ही ऐसा है कि वह कोई काम कर सके और कोई काम कर न सके। वह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखता है। वह हर काम अपने इरादे और हुक्म से करता है। जब आप अपने रब की नेचर और पॉवर को जान लेते हैं, तब आपकी कमज़ोरी दूर हो जाती है। अब आपके दिल में यह उम्मीद पैदा होती है कि आपका काम हो सकता है। आपका सोचने का अन्दाज़ बदल जाता है। पहले आप अपनी ताक़त देखकर सोचते थे कि यह काम नामुमकिन है। अब आप रब की ताक़त को देखकर यक़ीन करते हैं कि रब के लिए यह काम मुमकिन है। जब आप अपने रब के साथ होने का गहरा एहसास और उसकी अथाह ताक़त का गहरा यक़ीन रखने को अपनी ‘आदत’ बना लेते हैं, तब आपके सब काम उसके क़़ानून के तहत आसानी से होने लगते हैं।

पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि कोई शख़्स न मरे सिवाय इसके कि वह अल्लाह से अच्छा गुमान रखता हो। (बुख़ारी)



कौन लोग हैं जो ख़ौफ़ और ग़म से आज़ाद हैं?
सब कुछ आपके नज़रिये पर, आपकी आदतन सोच पर निर्भर है। जैसे सारा समाज सोचता है, आप वैसे न सोचें। आप ऐसे सोचने की आदत डालें, जैसे अल्लाह के वली सोचते हैं। अल्लाह के वली अल्लाह को अपने साथ महसूस करके, उसकी अथाह ताक़त पर पूरा भरोसा करके सोचते हैं। इसीलिए वे अल्लाह से हमेशा अच्छा गुमान रखते हैं। वे अपने मसलों को अल्लाह के सुपुर्द करते हैं। वे उनके हल के लिए अपने बातिन से और अपने ज़ाहिर से उसके हुक्म के मुताबिक़ अमल करते हैं और फिर जो भी अन्जाम ज़ाहिर होता है, वे उसे ख़ुशी से क़ुबूल करते हैं। वे अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहते हैं। ऐसे लोगों पर न ख़ौफ़ असर करता है और न वे ग़मज़दा रहते हैं।
याद रखो अल्लाह के दोस्तों पर न कोई ख़ौफ़ है और न वे ग़मगीन होते हैं। -क़ुरआन 10ः62

हर मुश्किल के साथ आसानी ज़रूर है
इसलाम यानि समर्पण एक नज़रिया है, एक क़ानून है और एक तरीक़ा है। सैकड़ों पेज की लाखों किताबें लिखी जा चुकी हैं, तब भी इसका पूरा बयान नहीं हो सका है क्योंकि यह ज़िन्दगी के हर पहलू के हरेक मसले का हल देता है। आपके मसलों का हल भी पहले से मौजूद है। हम इस छोटे से लेख में आपकी इन्फ़िरादी (व्यक्तिगत) ज़िन्दगी के उन मसलों का हल बता रहे हैं, जिन्हें आप अपनी या किसी भी इन्सान की ताक़त से हल नहीं कर पा रहे हैं। आप अल्लाह की मदद से इन्हें हल कर सकते हैं। यह एक शुरूआत है। इस आसान तरीक़े से आप अल्लाह की ताक़त से और उसके क़ानून से फ़ायदा उठाना सीखना शुरू कर सकते हैं। आपका कोई भी मसला हो, आप उसके लिए सारी कोशिशें करके हार चुके हों, आपने अपनी समझ के मुताबिक़ मेहनत, मन्नत, दुआ, नमाज़, क़ुरआन, चिल्ला, ख़ैरात, रत्न, ज्योतिष, तन्त्र-मन्त्र, अंगूठी, तावीज, रिश्वत और धमकी़, सब तरीक़े आज़मा लिए हों लेकिन आपका वह काम न हुआ हो। उसे भी आप एक नई और सही समझ के साथ आसानी से हल कर सकते हैं क्योंकि हर मुश्किल के साथ आसानी है।

हल का तरीक़ा आसान है
इस हल के अमल में छः आसान क़दम हैं। यह अमल अपने आप में आसान है। इसमें जिन्न-भूत, श्मशान और क़ब्रिस्तान जैसा कुछ नहीं है। इसमें चालीस दिन और सवा लाख का चिल्ला भी नहीं है। इसमें भूख, प्यास और दुनिया का त्याग नहीं है। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो आपको नुक़्सान पहुँचाए या मुसीबत में डाल दे। इसमें आपको सिर्फ़ क़ानूने क़ुदरत को समझना है। इसके लिए आपको क़ुरआन पढ़ना है और उसके मतलब को अपने दिल में जमाना है। इसे सब धर्म-मतों के लोगों के लिए आसान ज़बान में लिखा गया है। इसे सब लोग समझ और कर सकते हैं। इसे बूढ़ा, बच्चा, जवान, औरत, ज्ञानी और अज्ञानी सब कर सकते हैं। मज़ेदार बात यह है कि इसे बच्चे ज़्यादा अच्छी तरह करते हैं क्योंकि उनका दिल साफ़ होता है और सहज विश्वास और कल्पना उनके स्वभाव का हिस्सा होता है।

समर्पण का पहला क़दम
1. अपना दिल पाक कीजिए- आपको अन्दाज़ा नहीं है कि आपके दिल में कितनी ज़बर्दस्त ताक़त है। जो कुछ आप अपने दिल में रचा बसा लेते हैं। वह आपकी ज़िन्दगी के हालात में ज़ाहिर हो जाता है। आपको अपने दिल की ताक़त से काम लेना सीखना होगा। जब दिल में डर, ग़म, ग़ुस्सा और तनाव भरा होता है, तब आपके दिल की ताक़त आपके खि़लाफ़ काम कर रही होती है और आपकी ज़िन्दगी में डर, ग़म, ग़ुस्से और तनाव के हालात बनते हैं। जब आपका दिल ख़ुश होता है, उसे चैन और सुकून होता है, तब उसकी ताक़त आपकी भलाई में काम करती है और आपकी ज़िन्दगी में ख़ुशी और चैन-सुकून के हालात ही बनते हैं। अपने आपको अल्लाह के रंग में रंगना शुरू करें। उसके अख़लाक़ (अच्छे गुणों) को अपनाएं। इससे आपका दिल बुराई से पाक हो जाएगा। उसे चैन, सुकून मिलेगा, ख़ुशी मिलेगी।
अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया हैः लोगो! जिस्म में माँस का एक लोथड़ा है, जो सही हो जाए तो सारा जिस्म सही हो जाता है और अगर बिगड़ जाए तो सारा जिस्म बिगड़ जाता है। याद रखो वह दिल है। (सही मुस्लिम)
आपके दिल का असर आपके सारे वुजूद पर पड़ता है। जब आप किसी से नाराज़ होते हैं और ग़ुस्सा करते हैं तो आपका पूरा जिस्म कांपने लगता है। उस हालत में आप जो कुछ बोलते या करते हैं, उसका असर आपकी पूरी ज़िन्दगी के हालात पर पड़ता है और वह असर बुरा ही होता है। अगर आप उस ग़ुस्से को ज़ाहिर नहीं करते तो आपके अन्दर मनोरोग पैदा हो जाते हैं। आप चिड़चिड़े और चिन्तित रहने लगते हैं। आप ख़ुश नहीं रह पाते। जिससे आपके घरेलू और कारोबारी रिश्तों में ख़राबी आ जाती है। आपके काम बिगड़ने लगते हैं। आप हर वक़्त थके थके से रहते हैं। आपमें एनर्जी का लेवल कम हो जाता है। दबे हुए ग़ुस्से से कैंसर जैसी ख़तरनाक बीमारी होने के केस सामने आए हैं। जब दिल को ठीक किया गया तो जिस्म से कैंसर भी मिट गया।
आपका दिल आपके हर काम पर असर डाल रहा है। इसलिए सबसे पहले इसे साफ़ और सही कर लीजिए। दिल को नुक़्सान देने वाले जज़्बे और एहसास को पहचानिए और उनसे अपने दिल को पाक कीजिए। आप रहम करें, दूसरों पर भी और ख़ुद पर भी। आप माफ़ करें, दूसरों को भी और ख़ुद को भी। आप जिससे नाराज़ हों, उसे माफ़ कर दें। हो सकता है कि आप ख़ुद से ही नाराज़ हों। आप अपने आप को भी माफ़ कर दीजिए।
अपने आप को माफ़ करने का मतलब यह है कि अपने अन्दर ख़ुद को नाकाम और बेकार मानना छोड़ दें। हर वक़्त अपने आप को दोष देना और कुढ़ना छोड़ दें। गुज़रे हुए दौर की पुरानी कड़वी बातों से अपने ज़ख़्म ताज़ा करने की आदत को छोड़ दीजिए। अपने आप से नफ़रत करना, अपने आप को हर वक़्त कमियों के पहलू से देखना और अपने आप में शर्मिन्दा रहने की बुरी आदत से तौबा कीजिए। जब भी आप किसी ख़ता और गुनाह पर शर्मिन्दगी महसूस करें, फ़ौरन तौबा कर लें। तौबा का मतलब है अल्लाह की तरफ़ पलटना। जब आप तौबा करते हैं तो अल्लाह फ़ौरन माफ़ कर देता है। जिन गुनाहों की वजह से अपने दिल पर शर्मिन्दगी का बोझ ढोते फिर रहे हैं, उसे तौबा करके उतार दीजिए। आपको फ़ौरन बहुत राहत मिलेगी।
अगर आप किसी दूसरे आदमी से नाराज़ हैं तो  आप उस आदमी का नाम लें और कहें कि मैं ...... को माफ़ करता हूँ। ऐसा बार बार कहें। एक वक़्त आएगा जब आपके सामने उस आदमी का नाम आएगा तो आपके दिल में उसकी याद से कोई तकलीफ़ न होगी। तब आप जान लें कि माफ़ी का अमल पूरा हो गया है क्योंकि आपका दिल सेहतमन्द हो गया है।
आप दूसरों से उम्मीदें रखते थे, उन्होंने पूरी नहीं की। आपका दिल ज़ख़्मी हो गया। कई बार लोगों को आपकी उम्मीदों का पता तक नहीं होता। जिन्हें पता भी होता है तो हमेशा वे भी आपकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकते। दूसरों को न बदलें। अपनी आदत बदलें। किसी इन्सान से कोई उम्मीद न रखें। सिर्फ़ अपने एक रब से ही सारी उम्मीदें रखें।
किसी से डरें नहीं और न ही किसी से उसकी किसी चीज़ का लालच रखें।
किसी आदमी या किसी चीज़ को अपने ऊपर ग़ालिब या हाकिम न समझें। किसी को अपना नफ़ा या नुक़्सान पहुंचाने वाला न समझें। हुक्म सिर्फ़ एक रब का चलता है, बाक़ी सब सिर्फ़ ज़रिया बनते हैं।
दूसरों से अपनी या अपनी चीज़ों की तुलना न करें। वर्ना आप फ़ौरन ख़ुद को दूसरों से कम पाएंगे और आपको दुख होगा। अपने आपको ख़ुद ही दुख न दें। दूसरों के पास दूसरों की नीयत और अमल का फल है और आपके पास आपकी नीयत और अमल का फल है। यहां हरेक के पास वही है, जो कि रब के क़ानून के तहत उसके पास होना चाहिए था।
अपने दिल पर हमेशा नज़र रखें। उसमें उठने वाली ख़्वाहिशों को देखें, उसमें बनने वाली तस्वीरों को देखें और जो चीज़ भी रब को नापसन्द हो उसे अपने दिल से हटा दें। अपने दिल में हमेशा ऐसी बातें सोचें, जिन्हें रब पसन्द करता है क्योंकि रब उन्हीं बातों को पसन्द करता है जिनसे आपका भला होता है।
आपके सामने से आपका दुश्मन गुज़रे या कोई लड़का या लड़की या कोई दौलतमन्द या कोई फ़क़ीर गुज़रे तो आप अपने दिल पर नज़र डालें। अपने दिल पर पड़ने वाले असर को देखें। आपको वहाँ उनके बारे में एक राय, एक नज़रिया मौजूद मिलेगा। आपको वहाँ कुछ तस्वीरें मिलेंगी। उनमें कुछ बुराई होगी तो उसका पता आपको अपने अन्दर पैदा होने वाले एहसास से चलेगा। कोई बुरा एहसास होगा तो आपको अपने दिल में घुटन और बेचैनी महसूस होगी। आप उन्हें माफ़ कर दें हालाँकि उन्होंने आपसे माफ़ी नहीं माँगी है। इस माफ़ी का ताल्लुक़ उनसे कम और आपसे ज़्यादा है। माफ़ी का मतलब है ‘छोड़ देना’। आप उनके बारे में अपने नज़रिए में कोई बुराई पाएं तो आप उनके बारे में अपने नज़रिए को छोड़ दें। भले ही आप दूसरों की बुराई के बारे में सोच रहे हैं लेकिन दिल तो अपना है। आप अपना ही दिल गन्दा कर रहे हैं। आप उन्हें उनकी अच्छाई के पहलू से देखने का नज़रिया अपनाएं। आप दूसरों के साथ वैसा बर्ताव करें, जैसा बर्ताव आप दूसरों से अपने साथ किया जाना पसन्द करते हैं। इससे आपका दिल बुराई से पाक हो जाएगा। लोगों की भलाई में अपना माल ख़र्च करने से भी दिल पाक होता है।

आप अपने दिल में जब भी कोई बुराई पाएं तो आप ‘सुब्हानल्लाह’ कहें यानि अल्लाह पाक है। अल्लाह की पाकी को याद करें। आपका दिल अल्लाह के ज़िक्र पर आ जाएगा और इस तरह आपका दिल शिर्क और बुराई से पाक हो जाएगा।
आप चेक कीजिए। इस वक़्त आप अपने फेफड़ों में छोटे छोटे साँस ले रहे होंगे जिसकी वजह आपके अन्दर बैठा हुआ डर और तनाव है। ऐसे में आपका इम्यून सिस्टम ठप्प होता है और ऐसा आदमी किसी भी बीमारी का आसान शिकार होता है। जब भी आप का ध्यान अपने साँस पर जाए। आप पेट तक गहरे गहरे साँस लें जैसे कि आप गोद के बच्चों को पेट तक गहरे साँस लेते हुए देखते हैं. इससे आपका डर और तनाव दूर होगा। आपका ऑक्सीजन लेवल बढ़ेगा। आपका एनर्जी लेवल बढ़ेगा। आपका इम्यून सिस्टम मज़बूत हो जाएगा। सेल्युलर लेवल पर टॉक्सिन्स साफ़ होंगे। जिस्म गन्दगी से पाक होगा। दिल को सुकून मिलेगा। तन मन बीमारी से सलामत रहेंगे।
अपने लिए कभी बुरी मिसालें न दें जैसे कि मेरा दिल ज़ख़्मी है या मेरा कलेजा छलनी है। जो आप बोलते हैं, आपके दिल की ताक़त उसे पूरा करने में जुट जाती है और आपको पता भी नहीं होता। हम देखते हैं कि ज़रा सी बात होती है और लोग कह देते हैं कि ज़िन्दगी जहन्नम बन कर रह गई हैं या जीवन नर्क हो गया है। ऐसे ही औरतें अपनी औलाद को कोसती रहती हैं। वे कहकर भूल जाते हैं लेकिन किसी वक़्त पर उनके बोल पूरे होकर सामने आ जाते हैं। आप बोलें तो अच्छी बात बोलें वर्ना ख़ामोश रहें।
हरेक आदमी के अन्दर ईमान, यक़ीन, मुहब्बत, माफ़ी, मदद, रहम, सब्र, शुक्र, तौबा, हिम्मत, उम्मीद, भरोसा, सेल्फ़ कॉन्फ़िडेन्स और बर्दाश्त जैसी ख़ूबियां होती हैं। आपमें भी हैं। आप इन्हें बढ़ाएं, यहां तक कि आपकी अच्छाईयाँ आपकी बुराईयों पर हावी हो जाएं।
अक्सर इन्सान में समाज के असर से डर, शक, जल्दबाज़ी, लालच, घमण्ड, जलन, ग़ुस्सा, नफ़रत, इन्तेक़ाम, दुश्मनी, बुरी सोहबत, दिखावा, ख़्वाहिशों की ग़ुलामी, रस्मों की पाबन्दी, बदगुमानी, झूठ और ग़ीबत जैसी बुरी आदतें भी होती हैं। इन आदतों के रहते आप कामयाबी और ख़ुशी नहीं पा सकते। ख़ुद को इन बुरी आदतों से पाक करना शुरू करें। इसका तरीक़ा यह है कि जब भी कोई बुरी ख़्वाहिश या बुरी आदत ज़ोर दिखाए तो आप उसके मुताबिक़ कोई अमल न करें। उसके मुताबिक़ अपने दिल में कुछ न सोचें और न ज़ुबान से कुछ बोलें और न ही हाथ पैर से कुछ करें। वह बुरी ख़़्वाहिश और बुरी आदत कमज़़ोर पड़ जाएगी। यह उस बादशाही की शुरूआत है, जो कि रब ने अपने बन्दे के लिए पसन्द की है।

ये पयाम दे गई है मुझे बादे सुब्ह गाही
ख़ुदी के आरिफ़ों का मक़ाम है पादशाही
-अल्लामा

दिल अलामत (प्रतीक symbol) के ज़रिये असर जल्दी क़ुबूल करता है। दिल की पाकी के लिए ही ज़ाहिरी बदन को पाक रखा जाता है। जब ग़ुस्ल (नहाने) की ज़रूरत हो तो ग़ुस्ल कर लें। जब वुज़ू की ज़रूरत हो तब वुज़ू कर लें। जब भी ग़ुस्ल और वुज़ू करें तब आप यह गुमान ज़रूर करें कि जैसे मेरे बदन की गन्दगी दूर हो रही है, ऐसे ही मेरे अन्दर से भी सारी गन्दगी दूर हो रही है और अब मैं पाक हो रहा हूँ। इससे आपको बहुत फ़ायदा मिलेगा। आप फूल की तरह हल्के हो जाएंगे। आपकी बहुत सी बीमारियाँ और बुरी आदतें दूर हो जाएंगी। आपकी ताक़त, सेहत और दौलत में बरकत होगी। आपका चेहरा भी बदल जाएगा।
हमारी फूफी का तुजर्बा बहुत दिलचस्प है। उन्होंने अपने दिल को साफ़ किया तो उन्हें ये सब भलाईयाँ नसीब हुईं। उनका दिल बदलने का उनके चेहरे पर इतना ज़्यादा असर आया कि उनका चेहरा भी बदल गया। उसमें रौनक़ और ताज़गी आ गई। एक दिन वह बैंक गईं तो बैंक मैनेजर ने उनसे कहा कि हम आपको पहले से जानते हैं, इसलिए पहचान लेते हैं वर्ना अब आप पहचान में नहीं आतीं। आपका जो फ़ोटो आपकी पासबुक पर लगा हुआ है, आपका चेहरा अब उससे मेल नहीं खाता। प्लीज़ अब आप पुराने फ़ोटो के साथ एक नया फ़ोटो भी लगा लें। हमारी फूफी को अपनी पासबुक एक नया फ़ोटो भी लगाना पड़ा।

महबूब का साथ, ख़ुशी का राज़
कभी आपने अपने महबूब के साथ कुछ वक़्त गुज़ारा हो तो आप जान सकते हैं कि महबूब के साथ होने का एहसास लज़्ज़त देता है और हर जगह देता है। आप वीरान खण्डहरों में बैठे हुए जोड़ों के चेहरों पर भी  वैसी ही ख़ुशी देख सकते हैं जैसी कि पार्क में बैठे हुए जोड़ों के चेहरों पर देखी जाती है। यह एक निशानी है। इससे आप यह समझ सकते हैं कि हमें हक़ीक़ी महबूब के साथ होने का एहसास हो जाए तो हमें सच्ची ख़ुशी फ़ौरन अपने अन्दर ही मिल जाएगी। हमारा हक़ीक़ी महबूब हमारा इलाह, हमारा अल्लाह है। उसने आपको जो नेमतें दी हैं, उन्हें देखिए। आपको महसूस होगा कि वह आपसे कितना प्यार करता है। आप भी उसके लिए अपना प्यार ज़ाहिर करें। अपनी नेमतों से उसके बन्दों को फ़ायदा पहुंचाएं। उसका बार बार शुक्र अदा कीजिए इस बात पर कि वह आपसे प्यार करता है और आप उससे प्यार करते हैं।
आप उसके साथ होने को दिल की गहराई से, पूरी शिद्दत से महसूस कीजिए। उससे बातें कीजिए कि आप उससे क्या क्या गुमान रखते हैं? जब दिल इस एहसास से हट जाए तो फिर उसे इसी एहसास पर टिका दीजिए। ऐसा बार बार करते रहें। इससे आपके दिल में उसके साथ होने का एहसास क़ायम हो जाएगा। ख़ुशी आपकी आदत बन जाएगी। अब आप दुनिया के लोगों से प्यार और ख़ुशी की भीख माँगने की ज़रूरत से आज़ाद हो चुके हैं। ख़ुशी बाहर से मिलने वाली कोई चीज़ नहीं है कि कोई आदमी आपको बाहर से ख़ुशी देगा और कई महीने बाद देगा। ख़ुशी एक एहसास है, यह आपके अन्दर ही पोशीदा है। इसे आप अपने अन्दर ही पा सकते हैं। आप इसे जब चाहे, तब पा सकते हैं। जब आप दुनिया में सच्ची ख़ुशी के राज़ को पहचान लेते हैं, तब यह ख़ुशी आपके अन्दर से बाहर फैलने लगती है। अब आप दूसरों को भी यह पहचान कराने लगते हैं कि
‘ला इलाहा इल्-लल्लाह’ यानि अल्लाह के सिवा कोई हक़ीक़ी महबूब और माबूद नहीं है।
सब नबियों और सत्पुरूषों ने इसी एक हक़ (परम सत्य) की पहचान कराई है। इसी को ईश्वर अल्लाह की तरफ़ बुलाना कहा जाता है। लोगों ने अपनी ख़ुशी को बाहर की चीज़ों के मिलने पर टिका कर अपनी जान पर बहुत बड़ा ज़ुल्म कर लिया है। कोई भी चीज़ मिल जाए, वह उन्हें सच्ची ख़ुशी नहीं दे सकती लेकिन अगर उन्होंने पहले सच्ची ख़ुशी को पा लिया तो वे जिस चीज़ को चाहेंगे, वह उन्हें मिल जाएगी। आप इस ख़ुशी की हालत को क़ायम रख पाए तो आपकी मनोदशा पूरी तरह बदल जाएगी। जिसका असर आपके बाहरी हालात में भी ज़रूर झलकेगा। आपका मन और जीवन दोनों ही बदल जाएंगे। आपका दिल ग़म और डर से पाक हो जाएगा।

समर्पण का दूसरा क़दम
2. नीयत कीजिए- आप क्या चाहते हैं? आपकी गहरी ख़़्वाहिश क्या है? आपको यह बिल्कुल साफ़ साफ़ पता होना चाहिए। यह एक ऐसे काम की ख़्वाहिश हो, जो नेचुरल हो और जायज़ हो। जैसे कि एजुकेशन, शादी, मुहब्बत, जॉब, सेहत, मकान या ऐसी ही कोई चीज़ जो आपके डेवलपमेन्ट के लिए ज़रूरी हो।
आपका मसला चाहे कुछ हो और वह आपके लिए कितना ही मुश्किल हो, अगर आप यक़ीन तक पहुंच गए और फिर उसमें बने रहे तो आपका मसला हल हो जाएगा। यक़ीन के लिए आप अपने दिल में यह सवाल करें कि अगर अल्लाह मेरे इस काम को करना चाहे तो क्या वह कर सकता है?
आपके अन्दर ही फ़ौरन जवाब आएगा कि ‘हाँ, अल्लाह चाहे तो वह इस काम को ज़रूर कर सकता है।’
बस, इस यक़ीन के बाद आप सिर्फ़ अल्लाह के भरोसे पर अपने काम की नीयत कर लीजिए। इसके बाद उस काम के होने के असबाब आपके सामने ज़ाहिर होने लगेंगे। आप सोचते हैं कि पहले असबाब देख लूं, फिर नीयत करूंगा लेकिन अल्लाह के वली जानते हैं कि पहले नीयत कर ली जाए तो वह नीयत ख़ुद दूसरे असबाब को ज़़ाहिर करने का सबब बनेगी।
‘जब बन्दा किसी काम का इरादा करता है तो हक़ तआला उसके लिए उसके सामान जमा फ़रमा देता है।’ -शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह (उर्दू अनुवाद फ़ुयूज़े यज़्दानी मज्लिस 5 पेज नं. 52)
आप ग़रीब या मिडिल क्लास के आदमी हैं और आप ज़्यादा दौलत चाहते हैं तो आप दौलत की नीयत न करें बल्कि ऐसे कामों की नीयत करें, जिन्हें दौलतमन्द लोग करते हैं जैसे कि ज़कात देने और हज व उमराह करने की नीयत करें। आप अपने रिश्तेदारों को माल देने की नीयत करें। आप इन कामों को कर सकें, इसके लिए आपके पास ज़्यादा दौलत आने के नए असबाब ग़ैब से बनेंगे। अल्लाह ने अपनी रहमत से ऐसा इन्तेज़ाम किया है कि आपको अपनी ज़िम्मेदारियाँ अदा करने लायक़ दौलत और असबाब मिल सकें। आपके पास अब भी दौलत के जो रूप हैं, आप उनमें बरकत की नीयत कीजिए। आपको उनमें भी बरकत ज़रूर मिलेगी।

मिसाल
हमारी एक फूफी बुलन्दशहर में रहती हैं। सन 2016 की बात है। उन्हें देवबन्द मुन्तक़िल होना था। उन्हें वहाँ एक प्लॉट ख़रीदना था। उन्होंने हमसे कहा कि मैं यह मकान बेच दूंगी। हमने कहा कि क्यों? वह बोलीं कि यह मकान बेचकर ही तो इतना रूपया आएगा कि फिर हम उस रूपये से देवबन्द में प्लॉट ख़रीद सकें और फिर उस पर मकान बना सकें। हमने कहा कि अगर आप ऐसा सोचती हैं तो फिर आप इसी तरीक़े पर चलेंगी और आपका यह मकान बिक जाएगा। काम रूपये से नहीं बल्कि नीयत से होता है। आप देवबन्द में प्लॉट की नीयत कीजिए। हमारी फूफी ने हमारे कहने से देवबन्द में एक प्लॉट की नीयत कर ली। हमने कहा कि अब आपके दिल में, आपकी नीयत में आपका एक प्लॉट है। यह अन्दर से बाहर भी आ जाएगा, इन् शा अल्लाह!


समर्पण का तीसरा क़दम
3. अच्छा गुमान कीजिए- अब आप रब की मौजूदगी को महसूस कीजिए कि वह आपके साथ है। ‘रब’ नाम पर ग़ौर कीजिए। रब उसे कहते हैं-

  • जो पैदा करता है, 
  • पालता है और 
  • अपने काम को अन्जाम तक पहुंचाता है। 

आपको एक रब ने पैदा किया है, वही आपको पाल रहा है और वही आपको आपके अन्जाम की तरफ़ ले जा रहा है। जो काम आप अब कर रहे हैं, उन कामों को आपके रब ने पहले ही पैदा कर दिया था। उन कामों के आगे का पूरा सिलसिला भी रब ने पहले ही पैदा कर रखा है। आपको चुनाव की आज़ादी दी गई है। आप दूसरा काम चुनेंगे तो वह आपकी तरफ़ खिंचा चला आएगा। जैसी आपकी हालत होती है, वैसे ही आपके काम होते हैं। आप जैसे काम करते हैं, वैसा ही आपका अन्जाम होता है। आपका वुजूद, आपके काम और उन कामों का अन्जाम सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है। आज आप जिस अन्जाम को पहुंचे हैं, ऐसे ही पहुंचे हैं।

आपकी हर चीज़ आपके वुजूद से शुरू होती है और आपके वुजूद से ही जुड़ी रहती है और आपके वुजूद पर ही वह मुकम्मल होती है। जब आप अपने वुजूद पर से उन गन्दी परतों को उतारते हैं, जो समाज की सोच से चढ़ गई थीं तो आपके अन्दर आपकी असली शख़्सियत, आपकी ख़ुदी आज़ाद हो जाती है। यही वह आज़ादी है, जो हरेक इन्सान का मक़सद है। सही मायने में आपकी ज़िन्दगी अब शुरू होती है क्योंकि अब आप अपने नए हालात का चुनाव कर सकते हैं। यह चुनाव आप अपने वुजूद में करते हैं। जो आप बनना चाहते हैं, आप वह बनने का गुमान कर सकते हैं। आप उसे पूरी तरह देख और महसूस कर सकते हैं। अपने मक़सद को पूरा करने के लिए आप ज़रूरी चीज़ों को अपने पास देख और महसूस कर सकते हैं। आप उनके ‘होने’ पर शुक्र अदा कर सकते हैं। आप जिन चीज़ों को चुनते हैं और तरीक़े के मुताबिक़ उनके होने का गुमान करते हैं, आपका रब आपको वह बना देता है और आप को वह सब भविष्य में मिल जाता है।
अल्लाह कहता है कि
‘मैं अपने बन्दे के गुमान के साथ हूँ, जैसा भी गुमान वह मेरे साथ रखता है।’ (बुख़ारी व मुस्लिम)


सोचिए कि जिस प्रॉब्लम को आप हल करना चाहते हैं, जब उसे आपका रब अपने हुक्म से हल कर देगा तो वह काम होने के बाद कैसा लगेगा?
जैसे ही आप काम होने का गुमान करेंगे, फ़ौरन वह काम आपके दिल में उसी शक्ल में दिखाई देने लगेगा। यह शक्ल भी आपको अल्लाह के हुक्म से ही दिखाई देती है क्योंकि...
‘उसका काम तो यही है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उसे कह दे कि हो जा सो वह हो जाती है। वह पाक है जिसके हाथ में हर चीज़ की बादशाहत है और उसी की तरफ़ तुम्हें लौट कर जाना है।’ -यासीन 82 व 83



यह सृष्टि का महान रहस्य, तख़्लीक़ का अज़ीम राज़ है कि आप जिस चीज़ को पाना चाहते हैं, अल्लाह के हुक्म से वह चीज़ पहले आलमे अम्र में फ़ौरन हो जाती है और उसके बाद वह आलमे असबाब में यानि दुनिया में मुनासिब असबाब (साधनों) के ज़रिये अपने ठीक वक़्त पर मौजूद हो जाती है। आप पूरे ध्यान के साथ क़ुरआन, सूरह यासीन की आख़री ये दो आयतें पढ़ें। अगर आप अरबी में इन आयतों को नहीं पढ़ सकते तो आप इनका तर्जुमा ही पढ़ लें। इन आयतों का मतलब समझें और अल्लाह की अनन्त शक्ति को पहचानें, जिसकी निशानी उसने आपके अन्दर रखी है।

आप आयत नम्बर 82 से ऐसे फ़ायदा उठा सकते हैं जैसे कि एक ब्लैन्क चैक से फ़ायदा उठाया जाता है, जिसमें चेक देने वाला अपने सिग्नेचर कर देता है और रक़म की जगह ख़ाली छोड़ देता है। जब आप आयत नम्बर 82 पढ़ते हुए ‘शै’ (चीज़) लफ़्ज़ बोलें तो आप अपने दिल में उस चीज़ का तसव्वुर करें, जो आप पाना चाहते हैं। वह आपको अपने पास फ़ौरन मौजूद मिलेगी। इसी आयत में आगे जब ‘कुन’ (हो जा) लफ़्ज़ आए तो आप गुमान करें कि आपके रब ने आपके काम पर कुन यानि ‘हो जा’ कह दिया है। वह काम आलमे अम्र (ग़ैब) में हो चुका है। अब दुनिया में भी मुनासिब असबाब के सिलसिले के ज़रिये वह अपने ठीक वक़्त पर ज़ाहिर हो जाएगा। यक़ीनन यह काम अल्लाह के लिए आसान है। यह अपने रब से अच्छा गुमान करना है।
अब आप अपने दिल को देखें। अगर आपको अपने रब की अथाह क़ुदरत और उसकी रहमत पर यक़ीन होगा तो आपको यह भी गुमान होगा कि आपका काम हो जाएगा। ऐसा होगा तो आपका दिल ख़ुश होगा। जितना ज़्यादा आपका दिल ख़ुश होगा, उतना ज़्यादा आपका यक़ीन और गुमान अच्छा होगा। आपका यक़ीन और गुमान जितना ज़्यादा अच्छा होगा, आपका काम उतनी ज़्यादा आसानी से हो जाएगा।


मिसाल
हमारी फूफी के देवबन्द मे एक प्लॉट की नीयत करने के कुछ दिन के बाद उनका बेटा फ़रहान ख़ान देवबन्द गया तो उसके मामा ने उससे कहा कि मैंने एक पार्टनर की ज़मीन में एक नई कॉलोनी के प्लॉट कटवाए थे। उसमें मुझे हिस्से की शक्ल में एक प्लॉट मिला हुआ है। आप उसे अपने नाम करवा लो। फ़रहान बोला कि मेरे पास अभी रूपया नहीं है। उसके मामा ने कहा कि रूपया बाद में देते रहना। फ़रहान ने बुलन्दशहर लौट कर यह बात अपनी माँ को बताई। उन्होंने हमें बताई। हमने रब का शुक्रिया अदा किया, जिसने इतनी अच्छी कायनात बनाई है कि इसमें अच्छे गुमान से अच्छी चीज़़ें आसानी से मिलती हैं।
हमारी फूफी ने हमें कुछ हफ़्तों बाद बताया कि मेरे भाई का पार्टनर किसी वजह से उस प्लॉट का बैनामा करने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। मैं क्या करूं?
हमने कहा कि आप सूरह यासीन की आखि़री दो आयतें पढ़िए और अपने रब से गुमान कीजिए कि उस प्लॉट का बैनामा आपके हाथ में है। उन्होंने दो दिन ही यह अमल किया था कि उनके भाई ने उन्हें फ़ांन करके बुलाया। मुम्बई से हमारी बड़ी फूफी आई हुई थीं। वह समझीं कि वह उन्हें बहन की वजह से बुला रहे हैं। वह देवबन्द अपने मायके पहुंचीं तो उनके भाई उन्हें प्लॉट पर ले गये और फिर कोर्ट में ले गए। वह बोलीं कि मैं तो इस इरादे से नहीं आई थी। मेरे पास सरकारी स्टाम्प के लिए रूपये नहीं हैं। उनके भाई ने कहा कि तू फ़िक्र न कर। उनके भाई ने ही वह रक़म अदा की और वह प्लॉट बहुत आसानी से उनके नाम हो गया।
रब का शुक्र है।
हमने पूछा कि आपने कुन फ़यकून वाली आयतें कैसे पढ़ी थीं?
वह बोलीं कि मैंने तो अपने घर के काम करते हुए पढ़ी थीं।
हमने पूछा कि कितनी बार पढ़ी थीं?
वह बोलीं कि आठ नौ बार पढ़ी थीं।

आप इन्हें किसी भी वक़्त पढ़ सकते हैं और 7 या 11 बार या जितना चाहे उतना पढ़ सकते हैं। आप आयतों को ठहर ठहर कर मतलब समझते हुए पढ़ें। इसमें असल बात तादाद नहीं है बल्कि आपकी कैफ़ियत है। आप इन्हें रात को सोते वक़्त बिल्कुल आखि़र में और सुबह को बिस्तर से उठने से पहले ज़रूर पढ़ें। सबसे पहले आप अपना कमरा बन्द कर लें ताकि कोई दूसरा आपके अमल में दख़ल देकर आपकी तवज्जो न बंटा सके। फिर अपनी आँखें बन्द करके सिर से लेकर पैर तक अपने पूरे जिस्म को ढीला छोड़ दें। मौसम के हिसाब से चादर या कम्बल ओढ़ लें। अब आप दस बीस बार पेट तक गहरे गहरे साँस लें। इससे आपको सुकून मिलेगा। आपका दिल जितना ज़्यादा सुकून से होगा, वह उतना ज़्यादा अच्छा काम करेगा। आप ख़ुद को इस हाल में अपने जिस्म से अलग महसूस करेंगे। आप अपने होने को महसूस करेंगे और ‘अब’ के पल में महसूस करेंगे। यही है आपका वुजूद, जिससे आपका जिस्म ज़िन्दा है। अब आप अपने तसव्वुर में अपने पास अपनी चीज़ को मौजूद देखें। आप ऐसे ही तसव्वुर करें जैसे कि आप उस मन्ज़र का हिस्सा हैं। सब कुछ आप देख, सुन, सूंघ, चख और छू रहे हैं। आप अपने पाँचों सेन्सेज़ से काम लें। आप उसमें रंग, आवाज़ ख़ुश्बू, ज़ायक़ा और हाथ या बदन पर दबाव ऐसे ही महसूस करें जैसे कि आप सचमुच यह सब कर रहे हों। जब आप अपने दिल में यह सब कर रहे होते हैं तो वहां सचमुच यह सब हो रहा होता है।
दिल की दुनिया हक़ीक़ी दुनिया है। उसमें किसी चीज़ का होना सचमुच होना है। अक्सर लोग इस हक़ीक़त को नहीं जानते। वे किसी चीज़ के होने को सिर्फ़ तब मानते हैं जबकि वे उसे बाहर की दुनिया में अपनी आंखों से देख लेते हैं। इसका उन्हें ज़िन्दगी भर यह नुक़्सान उठाना पड़ता है कि उनकी ख़्वाहिशें पूरी नहीं होतीं। यहां तक कि बहुत बार उनकी ज़रूरतें तक पूरी नहीं होतीं। जब भी उनके दिल में किसी चीज़ की ख़्वाहिश ज़ाहिर होती है। वे बाहर की दुनिया में उसे अपने पास नहीं पाते या पा नहीं सकते तो वे उस चीज़ का ‘न होना’ और ‘न हो सकना’ मान लेते हैं। उनके ऐसा यक़ीन करने के बाद वह चीज़ उनके लिए नहीं होती।
हक़ीक़त यह है कि हरेक ख़्वाहिश जब दिल में ज़ाहिर होती है, तभी वह अपना एक वुजूद रखती है, जिसके वुजूद पर अगर शुक्र किया जाए तो उसका वुजूद बढ़ने लगेगा और वह चीज़ फिर बाहर भी नेचुरल तरीक़े से हो जाएगी। आपका शुक्र करना उसके वुजूद को हक़ीक़ी मानना है। जब आप उसके होने का यक़ीन करेंगे तो वह आपके लिए बाहर भी हो जाएगी। शुक्र से नेमत में ज़्यादती होती है। शुक्रगुज़ार रब से नेमतें पाता है जबकि नाशुक्रा अज़ाब (कष्ट) पाता है।
आप यह जान ही चुके हैं कि किसी चीज़ का दिल में होना, उस चीज़ के मौजूद होने का पहला दौर है। पहले दौर में कोई चीज़ है, तभी वह चीज़ बाद के, बाहर के दौर में मौजूद हो सकती है।

समर्पण का चौथा क़दम
4. मसले से तवज्जो हटाकर उसके हल पर जमाएं-  अपने हालात की ख़राबी पर ग़म करना और डरना छोड़ दीजिए। आप उनसे अपने जज़्बाती ताल्लुक़ (emotional attachment) छोड़ दीजिए। यह बात आपका काम होने के लिए बहुत ज़्यादा अहम है। आप उस बात पर राज़ी हो जाएं जो कि आपके साथ अब पेश आ रही है यानि आप यह समझ लें कि यह सब आपके रब के क़ानूने क़ुदरत के तहत ही आपको मिल रहा है। आपको कुछ और नहीं मिल सकता था। लोग और हालात उन चीज़ों के मिलने का सिर्फ़ ज़रिया और शक्लें हैं। इनमें अपनी कोई ताक़त नहीं है। इनमें लगातार बदलाव होता रहता है। इनमें ये ताक़त नहीं है कि रब इन्हें बदलना चाहे तो ये बाक़़ी रह जाएं। इन्हें अपने रब के हवाले कर दीजिए ताकि वह इन्हें बदल दे। इनकी शिकायतें करना, इन पर कुढ़ना और ख़ुद को बदनसीब मानना छोड़ दीजिए। ऐसा करते ही आपको सुकून मिल जाएगा। जिससे आपको पता चलेगा कि अब आपका वुजूद बदल चुका है। पहले यह बेचैन था और अब इसे चैन है। आपको चैन मिल जाए तो समझ लीजिए कि आपने अपनी प्रॉब्लम अपने रब को सौंप दी है। आपको चैन न मिले तो समझ लें कि आप अपनी प्रॉब्लम को अभी तक पकड़े हुए हैं। अपनी प्रॉब्लम पर ध्यान जमाए रखना और उसकी वजह से अपने जी में कुढ़ते रहना या लोगों से शिकायतें करते रहना, उसे पकड़े रहना है। जब तक आप अपनी प्रॉब्लम को पकड़े रहेंगे, तब तक वह आपकी ज़िन्दगी में बाक़ी रहेगी।
आपको लगता है कि आपके हालात ने आपको पकड़ रखा है लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल उल्टी है। आपने अपने हालात को बहुत मज़बूत जज़्बाती ताक़त से पकड़ रखा है। जब आप अपनी प्रॉब्लम से अपना जज़्बाती ताल्लुक़ छोड़ देते हैं और उसके हल से अपना जज़्बाती ताल्लुक़ जोड़ लेते हैं, तब आप उसे विदा होने की इजाज़त देते हैं। इसके बाद अल्लाह आपके सामने ऐसे लोग, मौक़े और साधन ज़ाहिर करता है, जिनसे आप काम लेते हैं और आपकी नीयत और आपको अच्छा गुमान पूरा हो जाता है।

समर्पण का पाँचवां क़दम
5. सबसे अच्छा और काफ़ी काम कीजिए- 
आप अपने हालात बदलना चाहते हैं तो आप अपनी प्रॉब्लम के बजाय उसके हल पर ध्यान जमाकर काम करें। काम का सबसे अच्छा और काफ़ी होना ज़रूरी है। सबसे अच्छा अमल वह है जो आप पूरे समर्पण के साथ करते हैं। जिसमें आप अपने दिल, दिमाग़ और जिस्म का इस तरह इस्तेमाल करते हैं कि आपका अमल आपकी मुराद पूरी होने के लिए काफ़ी हो जाता है। जब आप वह काम करते हैं, जिससे आप प्यार करते हैं तो फिर आप ख़ुद ब ख़ुद सबसे अच्छा काम करते हैं। सबसे अच्छा काम करने का मतलब दूसरों के मुक़ाबले में अच्छा काम करना नहीं है बल्कि अपने काम को सुधार कर अपनी बेस्ट परफ़ॉर्मेन्स देना है। जिस काम से आप प्यार नहीं करते, उसे आप दिल लगाकर नहीं करते। सो वह बस एक ख़़ानापूर्ति होती है। ऐसी ख़ानापूर्ति आपको कामयाबी नहीं दिला सकती। इसलिए हमेशा वह काम करें, जिसे आप पसन्द करते हों या फिर जिस काम को आप कर रहे हैं, उसे पसन्द करने लगें। जब आप अपनी पसन्द का काम करते हैं तो उसके लिए आप रिस्क उठाने से नहीं डरते और न ही रास्ते में आने वाली मुश्किलों की शिकायतें करते हैं। आप पॉज़िटिव एटीट्यूड के साथ काम करते हैं। हर आदमी की मुराद अलग है, उसी के हिसाब से प्लान बनाकर काम करना होगा। फिर जो भी आपके करने का अन्जाम ज़ाहिर हो, उस पर भी अपने रब से पूरी तरह राज़ी रहें। नतीजा आपकी मर्ज़ी के मुताबिक़ न निकले तो फिर से अपने रब के क़ानून को और ज़्यादा गहराई से समझें और दोबारा फिर ज़्यादा अच्छी कोशिश करें। बार बार की कोशिश से आपको अच्छा अमल करना आ जाएगा।
आम तौर से लोग यह मानते हैं कि कामयाबी के लिए सख़्त मेहनत ज़रूरी है लेकिन हमने अपने तजुर्बात से यह पाया है कि सख़्त मेहनत नहीं बल्कि काफ़ी मेहनत की ज़रूरत है। सख़्त मेहनत की ज़रूरत हमेशा नहीं पड़ती और हरेक काम में नहीं पड़ती लेकिन काफ़ी मेहनत की ज़रूरत हमेशा पड़ती है और हरेक काम में पड़ती है। जब आप कोई नया काम शुरू करते हैं तो आपको सख़्त मेहनत करनी पड़ेगी और वही आपके लिए काफ़ी होगी। जैसे जैसे आपकी प्रैक्टिस और आपकी महारत बढ़ती जाएगी, आपके लिए सख़्ती कम होती चली जाएगी। जिस काम को आप पहले मुश्किल से करते थे, उसी काम को आप अब आसानी से कर लेंगे। अब आपके लिए वह आसान काम काफ़ी हो जाएगा। जिस काम से आपका मक़सद पूरा हो जाए, वह आपके लिए काफ़ी कहलाएगा। याद रखें कि आप इल्म और हिकमत में, इन्टेलिजेन्स में जितना ज़्यादा तरक़्क़ी करेंगे, आपकी जिस्मानी मेहनत उतनी ही कम हो जाएगी। जहां सख़्त मेहनत की ज़रूरत हो, वहां सख़्त मेहनत कर लें। जब तक मक़सद पूरा न हो, तब तक काम करते रहें। जब मक़सद पूरा हो जाए तो समझ लीजिए कि अब आपका काम आपके लिए काफ़ी हो चुका है।
आप जो काम करें, उस काम के माहिरों से सलाह और गाइडेन्स ज़रूर लें। इससे आप बहुत सी मुश्किलों और नाकामियों से बच जाएंगे। जो लोग उस काम में कामयाब हो चुके हैं, आप उन्हें अपना दोस्त बना लीजिए। बाक़ी लोगों से अपने मक़सद की चर्चा न करें ताकि वे आपके दिल में शक और डर न डाल दें। शुरू में आपके पास अवसर, साधन और लोग कम होंगे लेकिन आप जैसे जैसे इन्हें इस्तेमाल करते जाएंगे, आपके सामने नए और ज़्यादा अवसर, साधन और लोग ज़ाहिर होते चले जाएंगे।
आप लॉजिक और इन्ट्यूशन, दोनों से काम लीजिए। अक्सर लोग इन्ट्यूशन से काम लेना नहीं जानते। इसकी वजह से वे कई बार कामयाबी से चूक जाते हैं। इन्ट्यूशन अतार्किक होती है। वह अचानक होती है। अचानक आपके दिल में किसी से मिलने की, किसी जगह जाने की या कोई काम करने की ज़ोरदार ख़्वाहिश पैदा होती है और आप नहीं जानते कि इसकी वजह क्या है? अगर वह ख़्वाहिश जायज़ है और उसे पूरा किया जा सकता है तो उसे ज़रूर करें। ऐसा करने पर आपको नए अवसर, साधन और लोग मिलेंगे, जो आपका मक़सद पूरा होने में मदद करेंगे।
यह दुनिया अमल की दुनिया है। अच्छे अमल का अन्जाम अच्छा निकलना तय है। आपको दुनिया में इसीलिए वुजूद बख़्शा गया है ताकि रब आपको सिखाए और आज़माए कि सबसे अच्छा अमल कैसे किया जाता है।


समर्पण का छठा क़दम
6. काम का फल पाने का वक़्त- 
उस घड़ी को वही रब जानता है, जिसके हुक्म से वह काम होगा। जिसके हुक्म से सूरज और चाँद घूमते हैं और अपने अपने मौसम पर बीजों से पेड़ निकलते हैं और पेड़ों पर फल लगते हैं। आप सुबह के वक़्त सूरज के निकलने को देखिए, आप रात में चांद की मन्ज़िलों को देखिए। सब अपने अपने वक़्त पर आपके सामने आ जाते हैं। एक बार फिर आप आसमान को ध्यान से देखिए क्या आपको कहीं कोई ख़राबी दिख रही है?
नहीं। हर चीज़ परफ़ेक्ट है।
आप बीजों को देखिए। हरेक बीज ज़मीन से अपने मौसम पर निकल आता है। बस उसकी केयर करनी होती है। आप पेड़ों को देखिए कि हरेक पेड़ अलग मौसम पर फल देता है और एक ही पेड़ का हर फल अलग घड़ी में पक कर गिरता है। सब पेड़ एक ही मौसम में फल नहीं देते और न ही एक पेड़ के सारे फल एक ही घड़ी में पकते हैं।
कलिमात (बोल) भी पेड़ों की तरह हैं। अच्छे कलिमात अच्छे पेड़ों की तरह हैं और बुरे कलिमात बुरे पेड़ों की तरह हैं। आप बोलने और सुनने के लिए अच्छे कलिमात को चुनें। आप उनकी केयर करते रहें। आप अपनी बातों में क़ुरआन और हदीस की बातें और दुआएं शामिल कर लें। आपके कलिमात अपने मौसम में ज़रूर फलेंगे और अपनी घड़ी पर वे ज़रूर पकेंगे। जब वे फलेंगे और पकेंगे तो आपको अच्छे फल मिलेंगे।
अपने कामों का अच्छा फल पाने को फ़लाह पाना कहते हैं। आप दूसरों को भी अपने रब के क़ानून पर अमल करने के लिए पुकारें। रब कहता है कि ऐसे बुलावे के बोल सबसे अच्छे बोल होते हैं।
अगर आपको क़ुदरती तरीक़े से सही वक़्त पर चीज़ें नहीं मिलतीं तो हम अपनी रिसर्च और तजुर्बात के बाद यह कह सकते हैं कि आपका नज़रिया और आपकी आपकी आदत में ही उसकी वजह छिपी हुई है। आप देखिए कि क्या आपमें टालमटोल की आदत है? आप अपनी ज़िम्मेदारियों को जल्दी पूरा करते हैं या वक़्त पर करते हैं या फिर उन्हें टाल देते हैं? जो आपकी आदत है, अक्सर उसी आदत के मुताबिक़ आपको मिलने वाली चीज़ों का वक़्त तय होता है। अगर आप वक़्त पर कोई चीज़ पाना चाहते हैं तो आपको वक़्त पर अपने काम करने की आदतें डालनी होंगी। इसी के साथ आप अपने नज़रिये को चेक करें। क्या आप इस तरह की बातों में यक़ीन रखते हैं?
आजकल शराफ़त का ज़माना ही नहीं है।
सीधी उंगली से घी नहीं निकलता।
जीवन एक संघर्ष है।

इस तरह की बहुत सी कहावतें और मान्यताएं समाज में फैली हुई हैं। जिनमें विश्वास करके आप अन्जाने में ही अपने काम को मुश्किल बना लेते हैं। आप अपने नज़रिए को ठीक कीजिए। इसके लिए आप अपने रब को इस कायनात में काम करता हुआ देखें। आपकी आँख उसे नहीं देख सकती लेकिन आप उसके कामों को देख सकते हैं। आपको ज़मीन और आसमान में अपने रब की क़ुदरत का मुशाहिदा (दर्शन) करने की आदत डालनी होगी। आप देखेंगे कि हर काम बिल्कुल सही वक़्त पर हो रहा है। आप भी अपने कामों को सही वक़्त पर करने की आदत डालें। नमाज़ों को सही वक़्त पर अदा करने से भी नज़रिये और आदत की ख़राबी का इलाज हो जाता है।

‘अल्लाह चाहे तो आँख झपकने से पहले कर दे’, आप अपनी रोज़मर्रा की बातों में इस बात को अक्सर दोहराया करें। इससे भी काम जल्दी होने का यक़ीन आपके नज़रिये का हिस्सा बन जाएगा और आपके काम जल्दी होने लगेंगे।

काम न होने या नतीजा उल्टा मिलने की वजह- जब आप समर्पण नहीं करते तो हमेशा आपको उल्टे नतीजे मिलेंगे।
जब आप अपनी प्रॉब्लम से अपना ध्यान नहीं हटाते।
जब आप शिकायतें करते हैं कि मेरा काम अब तक नहीं हुआ।
जब आप शक करते हैं कि यह काम कब होगा, कैसे होगा?
जब आप डरते रहते हैं कि कहीं आगे हालात और ज़्यादा ख़राब न हो जाएं तो आप बुरे बुरे गुमान करते हैं। इस तरह आप अपने लिए बुराई का चुनाव करते हैं और आपके हालात और ज़्यादा बिगड़ जाते हैं। घरेलू हिंसा और शौहर की बेवफ़ाई और तलाक़ के मामलों में जब हमने लड़कियों व औरतों से बात की तो पता चला कि उनके दिल में पहले से ही डर मौजूद था। आपका डर आपके कामों को बिगाड़ने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।
जब आप ख़ुद को पाक नहीं करते तो आपको नतीजा वह नहीं मिलेगा जो कि आप चाहते हैं बल्कि वह मिलेगा जैसे कि आप ख़ुद हैं।

आप ऐसे लोगों को देखेंगे कि वे ख़ुद को नहीं बदलते और अपने हालात बदलने की दुआ करते रहते हैं, उनके हालात नहीं बदलते। ये वे लोग हैं जो कि अल्लाह से अच्छा गुमान नहीं कर सकते बल्कि वे हालात ख़राब देखकर अपने भविष्य के बारे में बुरे बुरे गुमान करते हैं। कोई दूसरा तरक़्क़ी करता हैं तो वे उससे जलते हैं। वे उसे भी बुरी हालत में देखने के बुरे बुरे गुमान करते हैं। फिर उनके बुरे गुमानों की वजह से उन्हें नए अज़ाब (कष्ट) और ज़्यादा मिलते हैं। वे अपने लिए जहन्नम का, नर्क का ईन्धन बन रहे हैं। जिसमें वे इसी दुनिया में जलना शुरू हो जाते हैं। यह वह आग है, जो दिलों को जलाती है। इसमें ईन्धन भी वही होते हैं जो समर्पण नहीं करते और जलने वाले भी वे ख़ुद ही होते हैं।

जहन्नम से रिहाई और जन्नत का लुत्फ़
समर्पण से आप जहन्नम से, नर्क से मुक्ति पा सकते हैं। समर्पण से आप फ़ौरन जन्नत, स्वर्ग पा सकते हैं। इस जन्नत का, स्वर्ग का एहसास भी आपको अपने दिल में होगा और फ़ौरन होगा। आप अच्छे और पाक बोल से अपने दिल में फ़ौरन ताज़गी और सुकून महसूस करेंगे। आप अपने दिल में जो सुकून महसूस करते हैं, वह सचमुच होता है। आपके दिल में एक पूरी कायनात आबाद है।

हमारे सबसे छोटे भाई हिशाम ख़ान एक हर्बल काउन्सिलर हैं। उनसे खाल, बाल और पेट के बारे में सलाह लेने के लिए दूर दूर से हर उम्र के लोग उनके पास आते रहते हैं। उनका काफ़ी वक़्त मोबाईल (no. +919548811240) पर मुफ़्त सलाह देने में भी लगता है। रब का शुक्र है कि उनकी और हमारी ज़िन्दगी बहुत आसानी और लुत्फ़ के साथ गुज़र रही है। एक दिन हमने हिशाम ख़ान से कहा कि अल्लाह ने हमें दुनिया में भी जन्नत दे रखी है।  घर एक जन्नत है। उसने हामी में अपना सिर हिलाया। हमें लगा कि वह इस बात को पूरी तरह रियलाईज़ नहीं कर पाए हैं। हमने कहा कि जो आदमी आज अपने घर में आराम से खा पी रहा है। उसे हवा, पानी, गद्दे तकिये और आराम का मुनासिब सामान मयस्सर है। अगर उसे जहन्नम में डाल दिया जाए तो वह दुनिया के इस घर के आराम को क्या समझेगा? क्या उसे यह नहीं लगेगा कि वह जन्नत में था?
हिशाम ख़ान को इस बात का गहरा एहसास हुआ। हमें इस बात को आज और अभी महसूस करना होगा कि अल्लाह रहमान और रहीम है। उसने हमें दुनिया में भी बाग़, फल, नहरें और जीवनसाथी दिए हैं। उसने हमें दुनिया में भी जन्नत दे रखी है। समाज की सोच के असर से आदमी नेमत को खो देने के बाद उसकी एहमियत का एहसास करता है। क़ुरआन की तालीम है कि आप नेमत के मौजूद रहते हुए उसकी क़द्र करें, उसका सही इस्तेमाल करें। उस पर शुक्र करें।

कल का आईना है आज
आपका आज एक आईना है। जो आपने कल किया था, उसे आप अपने आज के हालात में देख सकते हैं। जो कुछ आप आज कर रहे हैं, उनका नतीजा आपके सामने कल आ जाएगा।
आपको भविष्य में क्या मिलने वाला है? इसका अन्दाज़ा आप आज अपने आमाल देखकर लगा सकते हैं।
क्या आप क़ुदरत के क़ानून के मुताबिक़ अमल कर रहे हैं या फिर उनके खि़लाफ़?
हर शख़्स को यह ज़रूर देख लेना चाहिए कि वह कल के लिए आगे क्या भेज रहा है?
आपका कल आपके आज में पोशीदा है और अपना आज आप पर साफ़ खुला हुआ है। जो कुछ उसने अमल किया होगा, उसी को वह कल हाज़िर पाएगा। इन्हीं बातों पर आपकी दुनिया की कामयाबी टिकी है और इन्हीं पर आपकी आखि़रत (परलोक) की कामयाबी टिकी है। इसीलिए कहते हैं कि इसलाम फ़लाहे दारैन का तरीक़ा है यानि समर्पण का नज़रिया और तरीक़ा इन्सान को दोनों लोक में कामयाब करता है। जिसे न जानने से लोग ज़िन्दगी की गाड़ी को जगह जगह ठोकते हुए फिर रहे हैं और एक दूसरे को ज़ख़्मी कर रहे हैं और हो रहे हैं।
जो लोग दावत का काम कर रहे हैं, उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों को क़ानूने क़ुदरत से काम लेना सिखाएं। उन्हें अच्छे नतीजे मिलेंगे तो वे ख़ुद जान जाएंगे कि वाक़ई यह हक़ है। यही क़ानूने क़ुदरत है, नेचुरल लॉ है।


एहसास की करिश्माई ताक़त से काम लीजिए
‘किसी आदमी के सीने में अल्लाह ने दो दिल नहीं बनाए।’ -क़ुरआन 33ः4
कोई भी इन्सान एक ही वक़्त में एक दूसरे के खि़लाफ़ दो बातों में यक़ीन नहीं रख सकता। जब एक इन्सान अपने दिल में दिन की रौशनी महसूस कर रहा हो, ठीक उसी वक़्त में वह रात का अंधेरा महसूस नहीं कर सकता। आपके एहसास से ही पता चलता है कि आप किस बात को सच मान रहे हैं? आपका एहसास आपके दिल की ताक़त है। इसी ताक़त से आपके काम होते हैं और इसी से आपके काम रूकते हैं।

एक अमीर ख़ूबसूरत बेवा ने हमसे सम्पर्क किया। उसने कहा कि वह एक शख़्स से निकाह करना चाहती है। वह शख़्स उसे चाहता है लेकिन वह उससे निकाह करने के लिए तैयार नहीं है। हमने कहा कि अल्लाह के लिए यह काम आसान है। हमने उसे दिल की करिश्माई ताक़त पर दो किताबें पढ़ने की सलाह दी। फिर हमने उन्हें ख़ुद बार बार सारा तरीक़ा बताया कि आप मौजूदा हालत का हल एक गुमान की शक्ल में अपने दिल में तसव्वुर करें। अल्लाह की ग़ैबी मदद से उसके होने की उम्मीद करें। जब आपका उस शख़्स के साथ निकाह हो चुका होगा, तब आप कैसी ख़ुशी महसूस करेंगी? उस एहसास को आप अपने दिल में अभी हाज़िर करें। यह अमल बार बार करें ताकि आपके दिल में यह गुमान जम जाए और ख़ुशी आपका ग़ालिब एहसास (dominant feeling) बन जाए। 6 माह से ज़्यादा हम यह बात उन्हें समझाते रहे। हफ़्ते में दो तीन बार वह हमें फ़ोन करती थीं। वह फ़ोन पर हमेशा यही कहती थीं कि ’अनवर भाई, मेरा काम अब तक नहीं हुआ। मैं एक तन्हा बेवा औरत हूँ। मुझे उसकी कमी का शदीद एहसास रूलाता रहता है। कई बार तो मैं डिप्रेशन में आकर हॉस्पिटल में भर्ती हो चुकी हूँ। प्लीज़ मेरा काम कर दीजिए।’
हम उन्हें यही जवाब देते थे कि आपका काम आपके यक़ीन के मुताबिक़ होगा। जो आपका एहसास है, वह आपका यक़ीन है। आपके काम में रूकावट ख़ुद आप ही हैं। आप यह एहसास छोड़ दें कि आपका निकाह नहीं हो रहा है। आप एक तन्हा और बेवा औरत हैं। आप बाहर के हालात अल्लाह के सुपुर्द करके उनसे अपना ध्यान हटा लीजिए। आप अपने दिल के गुमान पर तवज्जो दें। आपका काम हो जाएगा, इन् शा अल्लाह!
वह कहती थीं कि जब मेरा निकाह हो जाएगा तो तन्हा बेवा औरत होने का एहसास भी रूख़्सत हो जाएगा। ऐसे मैं अपना ध्यान अपने हालात से नहीं हटा सकती।

आज 10 माह हो चुके होंगे। वह आज भी एक तन्हा बेवा औरत हैं, जैसा कि उन्हें अपने बारे में एहसास रहता है। अपनी चाहत की उल्टी हालत का एहसास अपने दिल में ताज़ा रखकर आप अपनी चाहत की चीज़ नहीं पा सकतीं। पहले आपको उसे बदलना होगा जो कि आपके नफ़्स (वुजूद) में है। आप अल्लाह के इस क़ानून को समझ लें तो आप अपनी हालत ख़ुद बदल सकते हैं।
‘अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता जब तक कि वे ख़ुद उसे न बदलें जो उनके नफ़्स में है। -क़ुरआन 13ः11

दूसरा वाक़या एक लड़की बहार का है। उसके शौहर ने उसे मायके छोड़ दिया था। वह उसे लेने के लिए नहीं आता था और उसका बाप उसे उसके साथ भेजने के लिए तैयार नहीं था। उसकी ज़बानदराज़ी से उसके सास ससुर भी दुखी थे। तलाक़ तक नौबत आ चुकी थी। उसने अपने शौहर के अन्दर की ख़राबियाँ गिनानी शुरू कीं। फिर उसने अपने सास ससुर की कमियाँ बताईं। हमने कहा कि आज आपने यह सब बता दीं लेकिन आज के बाद इनकी शिकायत मुझसे या किसी से भी मत करना। आप इन बातों को अपने दिल में तन्हाई में भी मत आने देना। उन्होंने आपके साथ जो कुछ अच्छा किया है, आप उसे याद रखें, बस। वह बहुत बोलती थी। वह हमारी बात को कम सुनती थी और समझती बिल्कुल नहीं थी। आम तौर से लोगों की समझ यह बनी हुई है कि किसी तावीज़ से या कुछ पढ़ने से उनका शौहर उनकी मुठ्ठी में हो जाएगा। वे अपने अन्दर बदलाव लाकर अपनी हालत को बदल सकते हैं। वे इस बात को समझते ही नहीं हैं। उसे इस बात को समझने में चार महीने लग गए। उसके शौहर ने निकाह के लिए एक दूसरी लड़की को पसन्द कर लिया था। दोनों में प्यार भी परवान चढ़ चुका था। दोनों के घरवाले भी राज़ी थे। बहार को सारी कहानी पता चली तो उसने हमें भी बताई। हमने कहा कि आप क्या चाहती हैं?
बहार ने कहा कि मैं अपने शौहर के साथ उसके घर में रहना चाहती हूँ। हमने कहा कि आप अपने दिल में अपने शौहर के साथ उसी के घर में रहो और ख़ुद को उसी घर में महसूस करो। उसने सब कुछ तरीक़़े के मुताबिक़ किया। उसने मेरी उम्मीद से ज़्यादा समझदारी दिखाई। तक़रीबन 6 माह लगे। फिर हल्के हल्के हालात सुधरने लगे। एक दिन उसके शौहर ने उससे बात की। फिर एक दिन उसके शौहर की मंगेतर ने भी उससे बात की। पहले तो वह बहार से कहती रही कि वह उसके लिए अपने शौहर को छोड़ दे लेकिन फिर उसने ख़ुद ही उसके शौहर से अपना रिश्ता ख़त्म कर लिया। एक दिन उसका शौहर उसे न चाहते हुए भी लेने के लिए आ गया। ससुराल पहुँचने के पहले हफ़्ते में ही बहार प्रेग्नेन्ट हो गई जैसा कि उसने पहले ही बिल्कुल साफ़ नीयत कर रखी थी। उसकी सास और उसका शौहर इस सारी तब्दीली को देख तो रहे थे लेकिन उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि यह करिश्मा कैसे हुआ? उसकी सास उससे यही पूछते रहे कि बहार हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तू इस घर में आ कैसे गई? उसका शौहर उससे पूछता था कि मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं तुझे कैसे ले आया?

हमारी फूफी का काम कुन फ़यकून की आयत पढ़ने और अच्छा गुमान करने से सिर्फ़ दो दिन में हो गया क्योंकि उनके दिल में इस काम के खि़लाफ़ कोई ख़याल और जज़्बा पैदा नहीं हुआ। उन्हें इस बात की फ़िक्र नहीं थी कि उनका काम कब और कैसे होगा? न ही उन्होंने इस बात की शिकायत की कि उनका काम अब तक क्यों नहीं हुआ?

आज फिर आबिदा का एक वॉयस मैसेज आया। उसने कहा कि आप सही कहते हैं लेकिन क्या इसका कोई हल है?
हमने कहा कि ‘हल है लेकिन उसे करने के लिए आपकी बहन को अपने शौहर की बेवफ़ाई पर रोना धोना छोड़ना पड़ेगा।’
जिस हालत को विदा करना है, पहले अपने दिल से उसके एहसास को हटा दो और जिस हालत को ज़िन्दगी में लाना है, पहले अपने दिल में उसके होने के एहसास को हाज़िर करो। जब भी आप अपनी चाहत और अपने एहसास को एक कर लेंगी, ग़ैब से आपकी चाहत पूरा होने के असबाब बन जाएंगे।


दुख भरे गानों और ग़ज़लों से बचें
शौहर या अपने महबूब की बेवफ़ाई का शिकार लड़कियाँ उसकी बेवफ़ाई को भुला नहीं पातीं। वे उसकी कमी का शदीद एहसास करके रोती रहती हैं और ख़ुद को बदनसीब और नाकाम मानती रहती हैं। उन्हें इस बात के पुख़्ता सुबूत भी मिल जाते हैं कि वे दूसरों की साज़िश का शिकार बन गई हैं। उन्हें लगता है कि ज़माना ख़राब है। इस दुनिया में मुहब्बत का बदला मुहब्बत से नहीं मिलता। लोग मतलब निकल जाने के बाद मुंह मोड़कर चले जाते हैं। अब जीना बेकार है। ये सब वे ख़याल और तसव्वुरात होते हैं, जो उसे मनोरन्जन और फ़िल्मी गानों से मिले थे। अब वह उदास गाने और ग़ज़लें सुनती रहती हैं। जैसे कि

इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए
कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा
.....
जिया जले जाँ जले
नैनों तले धुआँ जले
......
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता
.......
रोएंगे हम हज़ार बार
कोई हमें रूलाए क्यूँ

ये सब उदास नग़मे और ग़ज़लें ज़िन्दगी का मायूस नज़रिया हैं। पहले इनसे मन को रंगा था तो आज वे ट्रेज्डी सीन ज़िन्दगी का हाल बन गए हैं। अब फिर से उन्हें दोहराया जा रहा है तो आगे हाल और ज़्यादा ख़राब हो जाएगा। यह सब नफ़्स का शर यानि अपने आपे की ख़राबी है।

प्यार देने से प्यार मिलता है, माँगने से नहीं
आपके क्रिएटर ने आपको अपना प्यार दिया। आप प्यार के नतीजे में पैदा हुए। उसने आपको ज़िन्दगी का तोहफ़ा दिया और आप पर अपनी ज़ाहिरी और बातिनी (छिपी) नेमतें पूरी तरह न्यौछावर कर दीं। आपने उसके प्यार को नहीं पहचाना, उसकी नेमतों पर ध्यान ही नहीं दिया। इसी एक बात से आपके हालात ख़राब होने शुरू होते हैं और फिर ज़िन्दगी के हर पहलू में ख़राबी पैदा हो जाती है।
जब आप अल्लाह से प्यार नहीं करते, तब आप सच्ची ख़ुशी को अपने अन्दर महसूस नहीं करते। आप अपने अन्दर प्यार और ख़ुशी की कमी महसूस करते हैं। तब आप प्यार और ख़ुशी बाहर से दूसरों से तलब करते हैं क्योंकि समाज से आपने यही सीखा है। वह प्यार आपको नहीं मिलता। जो आप तलब करते हैं, आपको वह नहीं मिलता। आपको वह मिलता है जो आप महसूस करते हैं। जब आप प्यार और ख़ुशी की कमी महसूस करते हैं, तब आपकी ज़िन्दगी में इनकी कमी का एहसास और ज़्यादा बढ़ जाती है। फिर आपकी ज़िन्दगी में ऐसे लोग आते हैं, जो आपको प्यार की कमी का एहसास और ज़्यादा कराते हैं। यह कमी सिर्फ़ तब दूर होती है जब आप अल्लाह से प्यार करते हैं और अपने अन्दर सच्ची ख़ुशी महसूस करते हैं। तब आप दूसरों से बदले की उम्मीद किए बिना उन्हें प्यार देते हैं और आप फ़ौरन प्यार और ख़ुशी में इज़ाफ़ा महसूस करते हैं। इसके बाद आपकी ज़िन्दगी में ऐसे हालात बनते हैं और ऐसे लोग मिलते हैं जो आपको प्यार और ख़ुशी ज़्यादा महसूस करने का ज़रिया बनते हैं।
किसी औरत का शौहर उससे प्यार नहीं करता। वह लोगों के समझाए से भी नहीं सुधरता। वह जैसा है, वैसा है। वह जो कर रहा है, उसे वह औरत बदल नहीं सकती लेकिन वह अपनी आदत तो बदल सकती है। वह अल्लाह की मुहब्बत को महसूस कर सकती है और वह अल्लाह से मुहब्बत कर सकती है। इससे उसे अपने दिल में फ़ौरन सच्ची ख़ुशी महसूस होगी। वह अपने शौहर से प्यार माँगना बन्द कर दे और वह अपने शौहर से प्यार करे और उससे बदले की उम्मीद के बिना लगातार प्यार करती रहे। उसके शौहर का बर्ताव कुछ वक़्त बाद बदलने लगेगा। एक बीवी जो कुछ अपने शौहर को देगी, वह क़ानूने क़ुदरत के मुताबिक़ उसकी तरफ़ पलटकर ज़रूर आएगा। हरेक बीवी अपनी आदत बदलकर अपने शौहर की आदत बदल सकती है। ताल्लुक़ात का सुधार इकतरफ़ा हमेशा किया जा सकता है।
जो लोग क़ानूने क़ुदरत से जाहिल हैं, वे कहेंगे कि वाह! यह क्या बात हुई कि शौहर तो प्यार न करे और बीवी एकतरफ़ा प्यार करती रहे, यह क्या बात हुई?
हक़ीक़त यह है कि जब आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं, तभी आप उसकी बाहर से, किसी दूसरे से माँग करते हैं। इस तरह आप अपनी एहसास की ज़बर्दस्त ताक़त को अपने ही खि़लाफ़ इस्तेमाल करते रहते हैं। आप जिस चीज़ की कमी महसूस करते हैं, उस चीज़ की कमी आपकी ज़िन्दगी में बनी रहती है। आपके बाहरी हालात और लोग प्यार की कमी महसूस करने का ज़रिया बनते रहते हैं। इन सब की जड़ तब कटती है, जब आप अपने अन्दर भरपूर प्यार और सच्ची ख़ुशी महसूस करते हैं। जब आप प्यार से भरे हुए होते हैं, तब आप प्यार देते हैं। आपको भी बाहर से, हर तरफ़ से प्यार मिलता है।
एक ख़ास बात यह भी है और बहुत अहम बात है कि जब आप किसी को प्यार देते हैं, किसी की मदद करते हैं, तब आप अपने अन्दर फ़ौरन ख़ुशी महसूस करते हैं। जिस चीज़ को आप अपने अन्दर महसूस करते हैं। वह चीज़ आपके अन्दर सचमुच होती है। इस तरीक़े पर अमल करने वाली औरत ख़ुशी पाने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहती। उसकी ख़ुशी पूरी तरह उसके अपने चुनाव और अपने फ़ैसले पर टिक जाती है। वह अपनी ख़ुशी और ज़्यादा बढ़ा लेती है जब वह अपने शौहर के बाहरी हालात से अपना जज़्बाती रिश्ता तोड़ लेती है और उन पर रोधा-धोना और ख़ुद को बेचारी, मज़्लूम और बदनसीब मानना छोड़ देती है और वह उसे अपने दिल में ख़ुद को प्यार करता हुआ देखती और महसूस करती है। उसके ‘अच्छे गुमान’ उसे फ़ौरन ख़ुशी देते हैं। यह पहला दौर होता है। इसके बाद दूसरा दौर भी आता है, जब उसके अच्छे गुमान हक़ीक़त बनते हैं और उसका शौहर बाहर की दुनिया में भी उसे प्यार करता है। जिसके गवाह सब बनते हैं। यह औरत के दिल की ताक़त है। जिसे वह जब चाहे तब इस्तेमाल कर सकती है।

जो शौहर अपनी बीवियों से प्यार न मिलने की शिकायत करते हैं। वे भी इसी तरीक़े से अपनी बीवीयों को प्यार देकर प्यार पा सकते हैं। प्यार पाना है तो प्यार की तलब को छोड़ दें। यह तरीक़ा अजीब लगता है लेकिन यहां मन की मुराद पूरी होने का यही क़ानून है।

कमाले तर्क से मिलती है याँ मुराद
     -अल्लामा इक़बाले

ग़रीबी हटाने और दौलत बढ़ाने का तरीक़ा
प्यार की ही तरह इन्सान दौलत भी ज़्यादा पा सकता है। ग़रीबी रूपये और चीज़ों की कमी नहीं है बल्कि ग़रीबी एक मनोदशा है। इस मनोदशा में इन्सान अपने पास ‘है’ को नहीं देखता बल्कि ‘नहीं’ को देखता है। इसमें भी इन्सान अल्लाह से प्यार नहीं करता, उसकी नेमतों पर शुक्र नहीं करता उसके पास ज़िन्दगी हो, सेहत हो, बीवी हो, बच्चे हों, मकान हो, लिबास हो, खाना हो, दोस्त हों, हज़ार नेमतें हों, वह इनके सबके होने पर भी सच्ची ख़ुशी महसूस नहीं करता। वह अपनी ज़िन्दगी में रूपये की कमी महसूस करके कुढ़ता रहता है। रूपये की कमी के एहसास से उसकी ज़िन्दगी में रूपये की कमी के और ज़्यादा हालात बनते रहते हैं। एक आदमी अपने दिल में जिस चीज़ की कमी को बार बार महसूस करता, उस चीज़ की कमी उसके पास बाहर भी बढ़ जाती है। एक ग़रीब आदमी के दिल में जब कोई ख़्वाहिश जन्म लेती है तो वह बाहर उस चीज़ के ‘नहीं’ होने को देखता है और अपने पास रूपये और साधन के ‘नहीं’ होने को देखकर उस चीज़ के ‘नहीं’ मिलने का यक़ीन कर लेता है। उसके ऐसा यक़ीन करने के बाद उसे वह चीज़ नहीं मिलती। आम तौर से वह कहता रहता है कि मैं ग़रीब आदमी हूँ। ऐसे लोग ज़िन्दगी भर दौलत की दुआएं माँगते रहते हैं, अपनी तरफ़ से भागदौड़ भी करते हैं लेकिन ये हमेशा रूपये की तंगी में जीते हैं। हमने पाया है कि सिर्फ़ नाशुक्री और क़ानूने क़ुदरत से जहालत की वजह से लोग ख़ुद को ग़रीबी में जीने पर मज्बूर किए हुए हैं। यह ग़रीबी उसे उस दिन छोड़ेगी जिस दिन वह अपने दिल में ‘ग़रीब होने का एहसास’ छोड़ देगा और ‘मैं ग़रीब हूँ’ कहना बन्द कर देगा।
उन पर अल्लाह ने ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वे ख़ुद अपने आप पर ज़ुल्म करते थे। -क़ुरआन 16ः33

हर इन्सान अमीर है। ग़रीब सिर्फ़ वह है जोकि अपने अन्दर और बाहर नेमतों को देख नहीं पाता। अल्लाह ऐसे लोगों का इलाज करने के लिए उनसे एक सवाल करता है, जिससे उनका ध्यान नेमतों पर जाता है-
क्या तुमने नहीं देखा कि जो कुछ आसमानों में और ज़मीन में है, सब को अल्लाह ने तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है और तुम पर अपनी ज़ाहिरी और छिपी नेमतें पूरी कर दी हैं? -क़ुरआन 31ः20

अमीरी एक मनोदशा है। इसमें इन्सान ‘है’ पर ध्यान देता है और ‘है’ को महसूस करता है और जो कुछ उसके पास ‘है’, उससे दूसरों को फ़ायदा पहुँचाता है। ग़रीबी को छोड़ने के लिए ज़रूरी है कि ज़िन्दगी, सेहत, बीवी, बच्चे, खाना, लिबास, मकान, रिश्ते-नाते, दोस्त और जो भी नेमतें उसके पास हैं, उनके होने को दिल में महसूस करे और उनके होने पर अल्लाह का शुक्र अदा करे। सबसे बड़ी दौलत ईमान और क़ुरआन की है, इनके होने पर अल्लाह का शुक्र अदा करे। इनकी पॉवर से हरेक मसले को पहले ही हल किया जा चुका है। अब उसे जानकर दोहराना भर है। उसके पास जितना भी रूपया हो, उसके होने पर शुक्र करे और उसे कम महसूस न करे बल्कि कहे कि अल्लाह ने उसे काफ़ी रूपया दिया है। बार बार ऐसा कहने से यह नज़रिया उसके दिल पर नक़्श हो जाएगा और फिर वह रूपया उसके लिए काफ़ी हो जाएगा। उसे जिस चीज़ की ख़्वाहिश हो, उसके मिलने को रूपये और असबाब से जोड़कर मायूस न हो बल्कि उसे अल्लाह की रहमत से जोड़कर देखे। यहां बताए गए तरीक़े के मुताबिक़ नीयत करे और उम्मीद करे कि अल्लाह उसे अपनी रहमत से ग़ैब से वह चीज़ देगा और उस चीज़ के मिलने के लिए ज़रूरी असबाब भी अल्लाह ग़ैब से अपनी क़ुदरत से ज़रूर बनाएगा। वैसी ही चीज़ दूसरों पर देखकर न कुढ़े बल्कि ख़ुश हो और शुक्र करे और उन्हें हिदायत और बरकत की दुआ दे। दूसरों से बात करे तो ‘बारकल्लाह’ कहकर उन्हें बरकत की दुआ दे। अल्लाह के ससूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर मुहब्बत के जज़्बे के साथ सलात व सलाम (दुरूद) भेजना भी बरकत की दुआएं करना है। इन्हें करने से आपको बरकत मिलेगी क्योंकि जो आप देते हैं वह पलटकर आपकी तरफ़ आ जाता है। 
अमीरी के तलबगार हरेक आदमी को माल की चाहत छोड़ देनी चाहिए और जो दौलत उसके पास ‘है’, उसे महसूस करना और उससे दूसरों को फ़ायदा पहुँचाना चाहिए। हरेक आदमी अपनी रोटी में से एक टुकड़ा सदक़ा कर सकता है, जिसे वह किसी परिन्दे को या किसी जानवर को खिला सकता है। वह परिन्दों, जानवरों और पेड़ पौधों को सदक़े की नीयत से पानी दे सकता है। वह किसी की मदद में एक रूपया ख़र्च करे तो अपने दिल में वह एक लाख रूपये ख़र्च करने को महसूस कर सकता है। हर आदमी अपने दिल में अमीर बन सकता है। वह जिन चीज़ों को पाना चाहता है, उन चीज़ों को वह अपने दिल में दूसरों को देते हुए देख सकता है और महसूस कर सकता है। अपने दिल में वह उन चीज़ों के होने पर शुक्र अदा कर सकता है। इससे उसे फ़ौरन ख़ुशी मिलेगी, जिससे उसके दिल से हर वक़्त की कुढ़न दूर हो जाएगी। उसकी मनोदशा बदल जाएगी।
यह पहला दौर है। वह शुक्र करता रहा और डटा रहा तो क़ानूने क़ुदरत के तहत बाद का दौर भी आएगा, जब अल्लाह उसके सामने नए मौक़े और नए असबाब खोलेगा। उसे पूरी होशमन्दी के साथ उन्हें पहचानना चाहिए और उनसे काम लेना चाहिए। तब उसका अच्छा गुमान दुनिया का सच बन जाएगा, जिसे सब देखेंगे। आप देते हैं तो आप पाते हैं।
जब आदमी अल्लाह के कामों पर ग़ौर करने लगता है तो उसे अपने चारों तरफ़ बहुत से मौक़े और साधन नज़र आने लगते हैं, जिन पर पहले उसने ध्यान नहीं दिया था। हर आदमी आँखें खोलकर देखे तो उसे अपने आस पास कुछ ऐसे लोग ज़रूर नज़र आ जाएंगे, जो पहले ग़रीबी का शिकार थे लेकिन फिर उनके हालात अच्छे हो गए। उनके पास काफ़ी माल आ गया। उनकी ज़िन्दगी में बदलाव आने की वजह का पता लगाये। जिस आदमी ने ईमानदारी और नेकी के साथ तरक़्क़ी की हो, उसके तरीक़े को आज़माए। अल्लाह की ख़ास रहमत यह है कि आजकल वेलनेस कोच और वैल्थ एडवाईज़र भी हैं, जो दौलत बढ़ाने की अच्छी सलाह देते हैं। उनकी फ़ीस न देने की हालत हो तो इन्टरनेट पर उनकी किताबों को मुफ़्त में पढ़ सकते हैं। इन्टरनेट पर आपको ऐसे बच्चे, जवान और बूढ़े मिलेंगे, जिन्होंने अपने हाथों से अपने घर पर कुछ बनाकर बेचा और करोड़ों रूपये कमाए। जब आप अपनी हालत बदलना चाहेंगे तब आपको हर तरफ़ बहुत से मौक़े नज़र आएंगे। हमने यह तरीक़ा कई लोगों को सिखाया और आज उनके पास काफ़ी माल है। हम यतीम बच्चों, ग़रीब जवानों और औरतों की मदद करते हैं तो उन्हें सिर्फ़ माल से ही मदद नहीं करते बल्कि उन्हें ग़रीबी की जड़ काटने का तरीक़ा सिखाते हैं। आप भी यह तरीक़ा ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को सिखाएं। उन्हें ख़ुशी दें। जो आप देंगे, वह पलटकर आपको ज़रूर मिलेगा।
आप ज़्यादा दौलत चाहते हैं अपनी हैसियत के मुताबिक़ किसी यतीम, मिस्कीन, बेवा या किसी ज़रूरतमन्द को सदक़ा दें, दान दें और बार बार ऐसा करें। आपका उनसे शुक्रिया की उम्मीद रखे बिना उन्हें बार बार माल देना, आपको अपने पास माल होने का एहसास कराएगा। माल होने का एहसास ‘अमीरी की मनोदशा’ है। इससे आपका माल और ज़्यादा बढ़ेगा। 

एक ही पैटर्न का दोहराव बन जाती है ज़िन्दगी
बच्चे जिन माँ-बाप के साए में परवरिश पाते हैं, उनके आपस में ताल्लुक़़ात कैसे हैं? इससे भी उनके मन पर रंग चढ़ता है। ज़्यादातर जवान होने पर उनकी ज़िन्दगी में वही रंग झलकने लगता है।
क़रीबी रिश्तेदारों और सहेलियों की शादीशुदा ज़िन्दगी की ख़राबी का असर भी लड़कियों पर पड़ता है। इसके अलावा समाज का चलन भी अपना असर छोड़ता है। जब आप ख़ुद आगाही (awareness) के साथ अपनी भलाई की बातों को नहीं सोचता तब आपके दिल में समाज का सामूहिक मन (mass mind) अपनी सोच डाल देता है। लड़कों के साथ भी यही होता है।
बच्चों के दिल पर अमीरी और ग़रीबी की छाप भी उनके घर से और उनके माहौल से ही नक़्श हो जाती है। उनके दिलों पर हर बात की एक छाप पड़ी हुई है। फिर यही छाप उनकी ज़िन्दगी के हालात में झलकने लगती है, जब वे बड़े हो जाते हैं। आप अपने बच्चों के दिल पर अच्छी छाप नक़्श करें। इसके लिए उन्हें बचपन में नबियों के और नेक लोगों के सच्चे क़िस्से सुनाएं। वे किस तरह लोगों से मुहब्बत करते थे, किस तरह वे उन पर अपना माल ख़र्च करते थे, किस तरह वे अपने घर वालों के साथ अच्छा बर्ताव करते थे, ये सब क़िस्से उन्हें बचपन में ही याद करा दें। उन्हें बुरे माहौल की बुरी छाप से बचाकर रखें। जैसे जैसे वे बड़े होते जाएंगे, उनके हालात में भलाई ज़ाहिर होती चली जाएगी।


वसवसों से बचने का तरीक़ा
ख़न्नास भी इस तरह के बहुत से वसवसे बार बार उनके दिल में डालता रहता है। उन पर भी नज़र रखने और उनसे अपने दिल को बचाने की ज़रूरत है। इनसे बचने का तरीक़ा यह है कि उदास गानों और नग़मों से बचो, जो लोग आपको बेचारा और बदनसीब कहें, उनके पास मत बैठो। आप पर जब बेचैनी और मायूसी छाने लगे, आपको भविष्य में अपने साथ बुरा होने का डर सताने लगे तो आप अल्लाह की बेहद रहमत और उसकी अथाह क़ुदरत पर नज़र जमा दें। ऐसी नेक औरतों के और नबियों के क़िस्से पढ़ें, जिन्होंने ईमान, सब्र, शुक्र, दुआ, दावत और इबादत के ज़रिये अपने शहर और मुल्क के हालात बदल दिए।

‘अच्छा गुमान करना बेहतरीन इबादत है।’ -अबू दाऊद

जब आप अपने लिए एक अच्छे काम की नीयत कर लें और उसके मुताबिक़ अपने रब से अच्छा गुमान भी कर लें तो फिर शिकायत से अपनी ज़ुबान, आँख, कान और दिल को पूरी तरह हटा लें। अपने दिल में तन्हाई में भी कोई ऐसी बात न सोचें जो कि उसके खि़लाफ़ हो। अपने मक़सद की सपोर्ट में सोचने, महसूस करने, बोलने और सुनने के लिए अपने दिलो-दिमाग़ को ट्रेनिंग दें। यह लगातार करने का काम है। बार बार पुरानी सोच वापस क़ब्ज़ा जमाने के लिए उभरती रहेगी। आप ख़बरदार रहें और अपनी नई सोच को अपने दिल में ताज़ा रखें। इसी नई सोच के मुताबिक़ आप अपना हर काम करें।

यह काम आप कर लें तो आपका हर काम आसान है।


क़ुरआन की पॉवर से सौ फ़ी सद कामयाबी 
आप ज़्यादा से ज़्यादा क़ुरआन पढ़ें। उसे अच्छी तरह समझें। उसमें अल्लाह ने अपना और अपनी ख़ूबियों का बहुत दिल मोहने वाला ज़िक्र किया है। वह आपसे प्यार करता है क्योंकि उसने आपको वुजूद बख़्शा, आपको ईमान और क़ुरआन जैसी नेमतें दीं। आप अपने मन को उसकी ख़ूबियों के ज़िक्र से भर लीजिए। जब भी आप लोगों से मिलें तो उन्हें क़ुरआन और हदीस से कोई ऐसी बात ज़रूर बताएं जिससे उनका कोई फ़ायदा हो, जिससे उनका कोई काम बने, जिससे उनकी कोई मुश्किल आसान हो। आपके अन्दर भी यह बात पैदा हो जाएगी कि जो आपको देखेगा और आपकी बातें सुनेगा, उसका दिल आपकी तरफ़ खिंचने लगेगा।
क़ुरआन अल्लाह का कलाम है। यह एक मुकम्मल नज़रिया है और फ़लाह का पैग़ाम है। यह एक ज़बर्दस्त ताक़त भी है। आप इसकी ताक़त से काम लेना सीखें। इन शा अल्लाह आपको काम के लिए रोने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आपकी हर मुराद पूरी होगी।

इस तरीक़े पर सही तरह अमल किया जाए तो यह सौ फ़ी सद काम करता है। अभी मई 2017 के तीसरे हफ़्ते में हमने कश्फ़ और पुरअसरार रूहानी क़ूव्वतों पर एक बुज़ुर्ग की किताब देखी। उन्होंने अमेरिका से पीएच. डी. भी की है। उसमें उन्होंने भी कुन फ़यकून की आयत और तसव्वुर की ताक़त की तासीर के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि ‘मैं आपको बार बार यक़ीन दिलाता हूँ कि इस अमल में देखा जाने वाला मन्ज़र 99 फ़ीसद होकर रहेगा। 1 फ़ीसद सिर्फ़ यह होगा कि अगर मन्ज़र आपके लिए ख़तरनाक है तो उसकी शक्ल बदल दी जाएगी।

आखि़र में हम पूरा तरीक़ा एक बार फिर मुख़्तसर (brief) तौर पर बयान कर रहे हैं-
1. अपना दिल को पाक कीजिए- अपने साथ अल्लाह को महसूस कीजिए। उसकी नेमतों को देखिए, उसके प्यार को महसूस कीजिए। उससे प्यार कीजिए। उसके बन्दों की सेवा कीजिए। इससे आप ख़ुश रहेंगे। अपने दिल को ग़म, डर और बुरे जज़्बात से पाक रखें। अल्लाह की ख़ूबियों को अपने अमल से ज़ाहिर कीजिए। आप रहम करें और माफ़ करें। अपने आपको और दूसरों को माफ़ करें। माफ़ी का अमल बार बार करें। लोगों की भलाई में अपना माल ख़र्च करें।

2. नीयत कीजिए- आप क्या चाहते हैं? आपकी गहरी ख़्वाहिश क्या है? आपको अपनी ख़्वाहिश बिल्कुल साफ़ साफ़ पता हो। आपको यक़ीन हो कि अगर अल्लाह चाहे तो वह अपनी ग़ैबी ताक़त से आपका काम कर सकता है। इसके बाद आप उस काम की या किसी चीज़ को पाने की नीयत कर लें।

3- अच्छा गुमान कीजिए- सोचिए कि जिस प्रॉब्लम को आप हल करना चाहते हैं, जब उसे आपका रब अपने हुक्म से हल कर देगा तो वह काम होने के बाद कैसा लगेगा?
जैसे ही आप काम होने का गुमान करेंगे, फ़ौरन वह काम आपके दिल में उसी शक्ल में दिखाई देने लगेगा। यह शक्ल भी आपको अल्लाह के हुक्म से ही दिखाई देती है क्योंकि...
‘उसका काम तो यही है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उसे कह दे कि हो जा सो वह हो जाती है। वह पाक है जिसके हाथ में हर चीज़ की बादशाहत है और उसी की तरफ़ तुम्हें लौट कर जाना है।’ -यासीन 82 व 83
आप ऐसे ही तसव्वुर करें जैसे कि आप उस मन्ज़र का हिस्सा हैं। सब कुछ आप देख, सुन, सूंघ, चख और छू रहे हैं। आप अपने पाँचों सेन्सेज़ से काम लें। आप उसमें रंग, आवाज़ ख़ुश्बू, ज़ायक़ा और हाथ या बदन पर दबाव ऐसे ही महसूस करें जैसे कि आप सचमुच यह सब कर रहे हों। जब आप अपने दिल में यह सब कर रहे होते हैं तो वहां सचमुच यह सब हो रहा होता है।

अब आप पूरे ध्यान के साथ क़ुरआन, सूरह यासीन की आख़री दो आयतें 82 व 83 पढ़ें। अगर आप अरबी में इन आयतों को नहीं पढ़ सकते तो आप इनका तर्जुमा ही पढ़ लें। इन आयतों का मतलब समझें-
‘उसका काम तो यही है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उसे कह दे कि हो जा सो वह हो जाती है। वह पाक है जिसके हाथ में हर चीज़ की बादशाहत है और उसी की तरफ़ तुम्हें लौट कर जाना है।’ -यासीन 82 व 83
जब आप आयत नम्बर 82 पढ़ते हुए ‘शै’ (चीज़) लफ़्ज़ बोलें तो आप अपने दिल में उस चीज़ का तसव्वुर करें, जो आप पाना चाहते हैं। वह आपको अपने पास फ़ौरन मौजूद मिलेगी। इसी आयत में आगे जब ‘कुन’ (हो जा) लफ़्ज़ आए तो आप गुमान करें कि आपके रब ने आपके काम पर कुन यानि ‘हो जा’ कह दिया है। वह काम आलमे अम्र (ग़ैब) में हो चुका है। अब दुनिया में भी मुनासिब असबाब के सिलसिले के ज़रिये वह अपने ठीक वक़्त पर ज़ाहिर हो जाएगा। यक़ीनन यह काम अल्लाह के लिए आसान है। यह अपने रब से अच्छा गुमान करना है।
आप इन्हें किसी भी वक़्त पढ़ सकते हैं और 7 या 11 बार या जितना चाहे उतना पढ़ सकते हैं। आप आयतों को ठहर ठहर कर मतलब समझते हुए पढ़ें। इसमें असल बात तादाद नहीं है बल्कि आपकी कैफ़ियत है। आप इन्हें रात को सोते वक़्त बिल्कुल आखि़र में और सुबह को बिस्तर से उठने से पहले ज़रूर पढ़ें। सबसे पहले आप अपना कमरा बन्द कर लें ताकि कोई दूसरा आपके अमल में दख़ल देकर आपकी तवज्जो न बंटा सके। फिर अपनी आँखें बन्द करके सिर से लेकर पैर तक अपने पूरे जिस्म को ढीला छोड़ दें। मौसम के हिसाब से चादर या कम्बल ओढ़ लें। अब आप दस बीस बार पेट तक गहरे गहरे साँस लें। इससे आपको सुकून मिलेगा। आपका दिल जितना ज़्यादा सुकून से होगा, वह उतना ज़्यादा अच्छा काम करेगा। आप ख़ुद को इस हाल में अपने जिस्म से अलग महसूस करेंगे। आप अपने होने को महसूस करेंगे और ‘अब’ के पल में महसूस करेंगे। यही है आपका वुजूद, जिससे आपका जिस्म ज़िन्दा है। अब आप अपने तसव्वुर में अपने पास अपनी चीज़ को मौजूद देखें। आप ऐसे ही तसव्वुर करें जैसे कि आप उस मन्ज़र का हिस्सा हैं। सब कुछ आप देख, सुन, सूंघ, चख और छू रहे हैं। आप अपने पाँचों सेन्सेज़ से काम लें। आप उसमें रंग, आवाज़ ख़ुश्बू, ज़ायक़ा और हाथ या बदन पर दबाव ऐसे ही महसूस करें जैसे कि आप सचमुच यह सब कर रहे हों। आप उसमें यह भी देखें कि दिन का वक़्त है या रात का? आप इसे बार बार करें यहां तक कि यह सीन आपके दिल में रच बस जाए। जब आप अपने दिल में यह सब कर रहे होते हैं तो वहां सचमुच यह सब हो रहा होता है।

4. मसले से तवज्जो (attention) हटाकर उसके हल पर जमाएं- अपने हालात की ख़राबी पर ग़म करना और डरना छोड़ दीजिए। आप उनसे अपने जज़्बाती ताल्लुक़ (emotional attachment) छोड़ दीजिए। यह बात आपका काम होने के लिए बहुत ज़्यादा अहम है। जब आप अपनी प्रॉब्लम से अपना जज़्बाती ताल्लुक़ छोड़ देते हैं और उसके हल से अपना जज़्बाती ताल्लुक़ जोड़ लेते हैं, तब आप उसे विदा होने की इजाज़त देते हैं। इसके बाद अल्लाह आपके सामने ऐसे लोग, मौक़े और साधन ज़ाहिर करता है, जिनसे आप काम लेते हैं और आपकी नीयत और आपको अच्छा गुमान पूरा हो जाता है।

5. सबसे अच्छा और काफ़ी काम कीजिए- 
आप अपने हालात बदलना चाहते हैं तो आप अपनी प्रॉब्लम के बजाय उसके हल पर ध्यान जमाकर काम करें। काम का सबसे अच्छा और काफ़ी होना ज़रूरी है। सबसे अच्छा अमल वह है जो आप पूरे समर्पण के साथ करते हैं। जिसमें आप अपने दिल, दिमाग़ और जिस्म का इस तरह इस्तेमाल करते हैं कि आपका अमल आपकी मुराद पूरी होने के लिए काफ़ी हो जाता है।  आप पॉज़िटिव एटीट्यूड के साथ काम करते हैं। हर आदमी की मुराद अलग है, उसी के हिसाब से प्लान बनाकर काम करना होगा। फिर जो भी आपके करने का अन्जाम ज़ाहिर हो, उस पर भी अपने रब से पूरी तरह राज़ी रहें। नतीजा आपकी मर्ज़ी के मुताबिक़ न निकले तो फिर से अपने रब के क़ानून को और ज़्यादा गहराई से समझें और दोबारा फिर ज़्यादा अच्छी कोशिश करें। बार बार की कोशिश से आपको अच्छा अमल करना आ जाएगा। आप जो काम करें, उस काम के माहिरों से सलाह और गाइडेन्स ज़रूर लें। इससे आप बहुत सी मुश्किलों और नाकामियों से बच जाएंगे। जो लोग उस काम में कामयाब हो चुके हैं, आप उन्हें अपना दोस्त बना लीजिए। बाक़ी लोगों से अपने मक़सद की चर्चा न करें ताकि वे आपके दिल में शक और डर न डाल दें। शुरू में आपके पास अवसर, साधन और लोग कम होंगे लेकिन आप जैसे जैसे इन्हें इस्तेमाल करते जाएंगे, आपके सामने नए और ज़्यादा अवसर, साधन और लोग ज़ाहिर होते चले जाएंगे। आप लॉजिक और इन्ट्यूशन, दोनों से काम लीजिए।

6. काम का फल पाने का वक़्त- आप बीजों को देखिए। हरेक बीज ज़मीन से अपने मौसम पर निकल आता है। बस उसकी केयर करनी होती है। फिर वह पेड़ बनता है और अपने मौसम में फल देता है। ऐसे ही आपका काम भी अपने ठीक वक़्त पर ज़रूर फल देगा। यह प्रकृति का नियम है। यह कब होगा? इसे सिर्फ़ अल्लाह ही जानता है। आप अपने काम वक़्त पर करने लगें तो इससे आपके दिल में एक छाप नक़्श हो जाएगी। उसके बाद जिन कामों को आप अपनी रूहानी ताक़त से करेंगे, वे ज़्यादा सही मौक़े पर फल देंगे।
‘अल्लाह चाहे तो आँख झपकने से पहले कर दे’, आप अपनी रोज़मर्रा की बातों में इस बात को अक्सर दोहराया करें। इससे भी काम जल्दी होने का यक़ीन आपके नज़रिये का हिस्सा बन जाएगा और आपके काम जल्दी होने लगेंगे।

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